अभी बॉलीवुड में ऐसे फ़िल्म निर्माताओं का बर्चस्व है जो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' और 'रचनात्मक आजादी' के नाम पर हिन्दू मान-मर्यादाओं का अपमान करते रहे हैं, देश पर हमले करने वाले जेहादियों का महिमामंडन करते रहे हैं। ये ऐसा करते रहे हैं और ये आगे भी ऐसे ही करते रहेंगे।...... ऐसे फिल्मकारों की हरकतों से स्वाभिमानी हिन्दू भड़कते रहे हैं और सड़कों में उतर कर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते रहे हैं........ लेकिन इन छिछोरे फिल्मकारों को उससे फर्क नहीं पड़ता, बल्कि इनकी फ़िल्में तो ऐसे विरोध प्रदर्शनों के बाद करोड़ों रुपए का व्यवसाय और कर लेती हैं।..... तो हमारे पास विकल्प क्या है ? क्या हम बस ऐसे ही बकवास करते रहेंगे या इन छिछोरे फिल्मकारों को कुछ सबक भी सिखाएंगे ?
वैसे हिंसक कार्यवाई से इनके मन में खौफ तो पैदा किया जा सकता है लेकिन इनकी गिरी हुई सोच का क्या करेंगे ?....... जरूरत है इनकी सोच पर हमला करने की..... जरूरत है बॉलीवुड में इन जैसे फिल्मकारों का बर्चस्व तोड़ने की।....
आज जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रवादी लोग बॉलीवुड में खुद को मजबूती से स्थापित करें और समाज और राजनीति के राष्ट्रवादी प्रभावशाली लोग अपनी विचारधारा के ऐसे लोगों को बॉलीवुड में स्थापित करने में अपने-अपने स्तर पर मदद करें। सड़क में खड़े होकर या सोशल मीडिया में बकवास करने से कुछ ख़ास नहीं होने वाला।....... हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग फ़िल्म बनाने लगेंगे तो इन छिछोरे फिल्मकारों को इनकी मांद में घुस कर इनकी औकात बताई जा सकती है।...... ऐसा पहले ही हो गया होता तो जैसे ही खबर पता चली कि 'जोधा-अकबर' नाम की फ़िल्म बनायी जा रही है वैसे ही कोई राष्ट्रवादी फिल्मकार महाराणाप्रताप पर फ़िल्म बनाता।..... और ठीक उसी दिन फ़िल्म रिलीज़ करता जिस दिन जोधा-अकबर रिलीज़ होती।...... एक युद्ध हल्दीघाटी पर लड़ा गया था....एक युद्ध बॉक्सऑफिस पर भी हो जाता।.....जोधा-अकबर में अकबर को हीरो बनाकर पेश किया गया, हम महाराणाप्रताप की फ़िल्म में अकबर को विलेन बताते। हम देश को बताते कि हमारे हीरो महाराणाप्रताप हैं, अकबर नहीं।
और ऐसा नहीं है कि हम ऐसा नहीं कर सकते थे, या अभी ऐसा नहीं कर सकते हैं। हमने ऐसा करके दिखाया है। सोशल मीडिया के साथ राष्ट्रवादी लोग इस प्रयोग को सफलतापूर्वक कर चुके हैं।
आप सभी जानते हैं, एक समय था जब देश में अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का एकमात्र माध्यम सिर्फ अखबार और न्यूज़ चैनल थे। तब ज्यादातर पत्रकार कांग्रेसी और वामपंथी पृष्ठभूमि के थे जो हिंदुत्ववादी विचारधारा और उनके नेताओं के खिलाफ खुल कर देश में माहौल बनाने की कोशिश करते थे।....... लेकिन फिर समय बदला और सोशल मीडिया के रूप में लोगों को भी अपनी बात फैलाने का माध्यम मिल गया। फिर क्या हुआ ? फिर देश के आम राष्ट्रवादी नागरिकों ने सोशल मीडिया में इन अखबारों और न्यूज़ चैनलों के कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकारों और इनकी पत्रकारिता की बत्ती बनानी शुरू कर दी। अब जरा ये भाजपा या आरएसएस के लिए जुबान खोल कर देखें...... सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रवादी लोग इनका ऐसा बैंड बजाते हैं कि लगभग हर छिछोरा पत्रकार खुद के ट्रोल होने को लेकर छाती पीटता रहता है।
कल तक इन फर्जी पत्रकारों के पास मीडिया का हथियार था, आज लोगों के पास सोशल मीडिया का हथियार आ गया है। इनको अब इनके ही हथियार से जवाब मिलने लगा है तो आधे से ज्यादा कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकार एकदम सीधे हो गये हैं।..... याद कीजिये पहले के गुजरात चुनाव में यही सेक्युलर पत्रकार मोदी के लिए क्या कुछ नहीं कहते थे ! आज बोल रहा है कोई ? अब ये राहुल गांधी की प्रशंसा तो कर रहे हैं लेकिन मोदी और भाजपा की आलोचना कोई नहीं कर रहा है।......
तो जो सबक ऐसे फर्जी पत्रकारों को राष्ट्रवादी लोग सिखाते हैं ऐसे ही सबक इन फर्जी फिल्मकारों को सिखाना भी जरूरी है। तभी कुछ सार्थक कार्य सिद्ध होंगे......... नहीं तो बस हम ऐसे ही जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते हुए सिर पीटते रहेंगे और ये ऐसे ही गंद फैलाते रहेंगे।
वैसे हिंसक कार्यवाई से इनके मन में खौफ तो पैदा किया जा सकता है लेकिन इनकी गिरी हुई सोच का क्या करेंगे ?....... जरूरत है इनकी सोच पर हमला करने की..... जरूरत है बॉलीवुड में इन जैसे फिल्मकारों का बर्चस्व तोड़ने की।....
आज जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रवादी लोग बॉलीवुड में खुद को मजबूती से स्थापित करें और समाज और राजनीति के राष्ट्रवादी प्रभावशाली लोग अपनी विचारधारा के ऐसे लोगों को बॉलीवुड में स्थापित करने में अपने-अपने स्तर पर मदद करें। सड़क में खड़े होकर या सोशल मीडिया में बकवास करने से कुछ ख़ास नहीं होने वाला।....... हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग फ़िल्म बनाने लगेंगे तो इन छिछोरे फिल्मकारों को इनकी मांद में घुस कर इनकी औकात बताई जा सकती है।...... ऐसा पहले ही हो गया होता तो जैसे ही खबर पता चली कि 'जोधा-अकबर' नाम की फ़िल्म बनायी जा रही है वैसे ही कोई राष्ट्रवादी फिल्मकार महाराणाप्रताप पर फ़िल्म बनाता।..... और ठीक उसी दिन फ़िल्म रिलीज़ करता जिस दिन जोधा-अकबर रिलीज़ होती।...... एक युद्ध हल्दीघाटी पर लड़ा गया था....एक युद्ध बॉक्सऑफिस पर भी हो जाता।.....जोधा-अकबर में अकबर को हीरो बनाकर पेश किया गया, हम महाराणाप्रताप की फ़िल्म में अकबर को विलेन बताते। हम देश को बताते कि हमारे हीरो महाराणाप्रताप हैं, अकबर नहीं।
और ऐसा नहीं है कि हम ऐसा नहीं कर सकते थे, या अभी ऐसा नहीं कर सकते हैं। हमने ऐसा करके दिखाया है। सोशल मीडिया के साथ राष्ट्रवादी लोग इस प्रयोग को सफलतापूर्वक कर चुके हैं।
आप सभी जानते हैं, एक समय था जब देश में अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का एकमात्र माध्यम सिर्फ अखबार और न्यूज़ चैनल थे। तब ज्यादातर पत्रकार कांग्रेसी और वामपंथी पृष्ठभूमि के थे जो हिंदुत्ववादी विचारधारा और उनके नेताओं के खिलाफ खुल कर देश में माहौल बनाने की कोशिश करते थे।....... लेकिन फिर समय बदला और सोशल मीडिया के रूप में लोगों को भी अपनी बात फैलाने का माध्यम मिल गया। फिर क्या हुआ ? फिर देश के आम राष्ट्रवादी नागरिकों ने सोशल मीडिया में इन अखबारों और न्यूज़ चैनलों के कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकारों और इनकी पत्रकारिता की बत्ती बनानी शुरू कर दी। अब जरा ये भाजपा या आरएसएस के लिए जुबान खोल कर देखें...... सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रवादी लोग इनका ऐसा बैंड बजाते हैं कि लगभग हर छिछोरा पत्रकार खुद के ट्रोल होने को लेकर छाती पीटता रहता है।
कल तक इन फर्जी पत्रकारों के पास मीडिया का हथियार था, आज लोगों के पास सोशल मीडिया का हथियार आ गया है। इनको अब इनके ही हथियार से जवाब मिलने लगा है तो आधे से ज्यादा कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकार एकदम सीधे हो गये हैं।..... याद कीजिये पहले के गुजरात चुनाव में यही सेक्युलर पत्रकार मोदी के लिए क्या कुछ नहीं कहते थे ! आज बोल रहा है कोई ? अब ये राहुल गांधी की प्रशंसा तो कर रहे हैं लेकिन मोदी और भाजपा की आलोचना कोई नहीं कर रहा है।......
तो जो सबक ऐसे फर्जी पत्रकारों को राष्ट्रवादी लोग सिखाते हैं ऐसे ही सबक इन फर्जी फिल्मकारों को सिखाना भी जरूरी है। तभी कुछ सार्थक कार्य सिद्ध होंगे......... नहीं तो बस हम ऐसे ही जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते हुए सिर पीटते रहेंगे और ये ऐसे ही गंद फैलाते रहेंगे।
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