कल रविवार को दिल्ली का बारहखंभा रोड़ 'विशिष्ट लैंगिक लक्षणों' वाले लोगों की सतरंगी परेड का गवाह बना। जिसमें हर साल की तरह समलैंगिकों और किन्नरों ने नाच-गा कर खुद पर गर्व प्रकट किया और धरना देकर अपने लिए समाज में समान अवसरों की मांग की।.... देखा जाए तो ये बड़े दुःख की बात है कि हमारे समाज में एक तबका ऐसा भी है जिसे इतने बड़े और परिपक्व लोकतंत्र में अपने लिए समान अवसर मांगने पड़ रहे हैं।.... यकीनन हमारे संविधान और समाज में लोगों को समान अवसर मिलते रहे हैं लेकिन समलैंगिकों और किन्नरों को एक नागरिक होने के नाते समाज में जो सम्मान और स्थान मिलना चाहिए वो सम्मान देने में हम कहीं न कहीं चूक जाते हैं।..... हमारे समाज में इनकी स्वीकार्यता अभी तक नहीं बन पायी है।...... खास तौर से पुरुषों के बीच में। महिलाऐं चूँकि थोड़ी उदार होती हैं इसलिए ऐसे 'विशिष्ट लैंगिक लक्षणों' वाले लोगों को उनके साथ रहने में उतनी असहजता नहीं होती जितनी पुरुषों के साथ होती है।....... जो कि बहुत गलत बात है। पुरुषों में ऐसे समुदाय के लोगों की स्वीकार्यता तो छोड़िये कई लोग तो इनके खिलाफ उग्र विरोध की मानसिकता रखते हैं। मानो कोई समलैंगिक है या किन्नर है तो उसने पता नहीं कौन सी गलती कर दी !
समलैंगिक या किन्नर होना कोई ऐसी बात नहीं है कि उन्हें घृणा या उपहास की नजर से देखा जाए। वो केवल एक लक्षण है जो हार्मोन्स के कारण प्रभावित होता है। और हार्मोन्स पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। हार्मोन्स की सक्रियता के कारण ही एक उम्र आने के बाद लड़के और लड़कियां एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। लेकिन जब किसी के हार्मोन्स गड़बड़ हो जाते हैं तो उसके लैंगिक लक्षण बदलने लगते हैं, फिर वो किन्नर भी बन सकता/सकती है और समलैंगिक भी। अब कोई समलैंगिक अपनी तरह के लोगों की ओर आकर्षित हो रहा है या हो रही है तो इसमें बुरी बात क्या है ? वो दूसरों को मजबूर तो नहीं कर रहे हैं कि तुम भी मुझे पसंद करो।...... अगर हम कुछ करना ही चाहते हैं तो हमें उन हार्मोन्स और उन कारणों का पता लगाना चाहिए जो किसी व्यक्ति के समलैंगिक होने के लिए उत्तरदायी हैं और उन हार्मोन्स के सही व्यवहार के लिए चिकित्सीय उपाय खोजने चाहिए। मगर जब तक हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तब तक कम से कम समलैंगिकों के प्रति भेदभाव तो न करें। हम कुछ अच्छा नहीं कर सकते हैं तो कुछ बुरा तो न करें।
और ऐसे ही किन्नरों की बात की जाए तो किन्नर भी हमारे समाज का हिस्सा हैं, जो उपेक्षा का शिकार है। अब अगर कोई बच्चा किन्नर निकला तो उसमें उसकी क्या गलती है ? क्या हम अपने समाज में किन्नरों को अपने साथ उठने-बैठने, पढाई करने, नौकरी करने के अधिकार नहीं दे सकते ?
हालाँकि किन्नरों के मामले में कुछ सकारात्मक होता हुआ भी दिख रहा है। अभी कुछ साल पहले भारत के चुनाव आयोग ने किन्नरों को वोट डालने का अधिकार दिया था। और अब कई जगह फॉर्म भरते हुए 'महिला' और 'पुरुष' से अलग एक 'ट्रांसजेंडर' का कॉलम भी रखा जाता है। पहले लिंग के कॉलम में सिर्फ पुरुष और महिला का ही विकल्प होता था। ये बातें समाज में किन्नरों की बढ़ती स्वीकार्यता की ओर इशारा करता है। और सिर्फ यही नहीं, हमारे संत समाज की ओर से भी किन्नरों को सम्मान देने के मामले में कुछ अच्छी पहल होती हुई भी दिख रही है। ऐसी ही एक पहल है 'किन्नर अखाड़ा'। हिन्दू सन्यासियों के 13 अखाड़ो में किन्नर सन्यासियों के लिए भी एक किन्नर अखाड़ा बनाया गया है।
किन्नरों के मामले में जहाँ हमारा नजरिया थोड़ा सकारात्मक हो रहा है वहीँ समलैंगिकों के मामले में ऐसे सकारात्मक नजरिया बनने की रफ़्तार थोड़ी धीमी है। हमारे समाज में समलैंगिकों को सामान्य लोगों की तुलना में गन्दा और अक्षम माना जाता है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। समलैंगिक भी उतने ही सामर्थ्यवान और बुद्धिमान होे सकते हैं जैसे एक सामान्य मनुष्य होता है। यूरोप के एक देश 'आयरलैंड' में तो जो भारतीय मूल के प्रधानमंत्री हैं वो एक समलैंगिक हैं। और सिर्फ आयरलैंड ही नहीं बेल्जियम, आइसलैंड, सर्बिया और लक्सेम्बर्ग जैसे देशों में समलैंगिक सत्ता संभाल चुके हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि ये उन देशों में हैं जिनका मानव विकास सूचकांक दुनिया में सबसे ज्यादा है। अर्थात् दुनिया भर में सबसे अच्छा जीवन स्तर इन देशों के लोगों का होता है। अच्छे जीवनस्तर का मतलब है कि वहां अस्पताल में जगह न मिलने के कारण किसी गर्भवती महिला को अपने बच्चे को बीच सड़क में जन्म नहीं देना पड़ता, वहां किसी अस्पताल में मरीज को रेहड़ी में नहीं लाया जाता, वहां कोई अनपढ़ नहीं होता, वहां कोई भूख से नहीं मरता, वहां किसी को अपने मृत परिजन को अस्पताल से घर अपने कंधे में उठाकर नहीं जाना पड़ता। इन देशों का जीवनस्तर बहुत अच्छा है क्योंकि उन्हें पता है उन्हें किस चीज के लिए लड़ना है। उन्हें पता है उन्हें समलैंगिकता से नहीं गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा से लड़ना है।
मगर हमारे देश में हम अपनी दकियानूसी सोच के कारण न केवल समलैंगिकों और किन्नरों का जीवन बर्बाद करते हैं बल्कि देश और समाज के काम आने वाली उनकी संभावित योग्यताओं और क्षमताओं का भी लाभ नहीं उठा पाते।
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