बुधवार, 16 दिसंबर 2015

केवल जीतना महत्वपूर्ण नहीं, जीत का लाभ उठाना भी जरूरी है।

हमने पाकिस्तान को चार-चार युद्धों में हराया है। सिवाय 1971 में बांग्लादेश बनाने के हमारे पास पाकिस्तान पर जीत की कोई और विशेष उपलब्धि नहीं दिखाई देती। उपलब्धि से मतलब है कि बाकी के युद्धों में हमें पाकिस्तान पर जीत से क्या मिला ? सवाल को थोड़ा सा घुमा दिया जाए और पूछा जाए कि अगर इनमें से एक भी युद्ध पाकिस्तान जीत जाता तो उसे क्या मिलता ? पाकिस्तान यदि जीत जाता तो यकीनन वो भारत के किसी न किसी हिस्से में कब्जा कर लेता और हम बस देखते ही रह जाते। मगर जीतने के बाद भी हम पाकिस्तानी जमीन पर कोई कब्ज़ा नहीं कर पाए हैं। इस मामले में देखा जाए तो पाकिस्तान की रणनीति हमसे बेहतर है। उसे हार के भी कुछ नहीं खोना पड़ता और हमें जीत कर भी कुछ नहीं मिलता। अब आप सोचोगे पाकिस्तान हमसे कैसे जीत जाएगा ? तो भैया पाकिस्तान हमसे वैसे ही जीत जाएगा जैसे मुहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान से जीता था। औकात पाकिस्तान की भी कुछ नहीं है और औकात उस मुहम्मद गोरी की भी कुछ नहीं थी। बस पृथ्वीराज चौहान और उसमे एक ही फर्क था कि गोरी को पता था उसे क्या चाहिए और पृथ्वीराज चौहान हम लोगों की तरह हवा में रहता था। तराईन के पहले युद्ध में जब पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को हरा दिया था तब उसे जिन्दा छोड़ दिया। मगर तराईन के दूसरे युद्ध में जब गोरी को मौका मिला उसने पृथ्वीराज को नहीं छोड़ा। और यही अब फिर से हो रहा है। हम जब जीतते हैं,  हम पाकिस्तान की जीती हुई जमीन छोड़ देते हैं मगर जिस दिन उसे मौका मिलेगा वो नहीं छोड़ेगा। हमें इतिहास में पढ़ाया जाता है कि हमारी हार का और दुश्मनों की जीत का सबसे बड़ा कारण था कि हमारे राजा आपस में लड़ते रहते थे। मगर ऐसा नहीं है, हमारी हार का सबसे बड़ा कारण था कि हमारे अंदर दुश्मनों से लड़ने की तमीज ना तो आज है और ना उस समय थी। रही बात आपस में लड़ने की तो केवल हमारे राजा ही नहीं बल्कि हमारे देश में आक्रमण करने वाले दुश्मन भी आपस में लड़ते रहते थे। फिर आप चाहे बाबर और इब्राहिम लोदी को देख लें या हुमायूँ और शेरशाह सूरी को देख लें। यही नहीं बाद में हमारे देश में राज करने वाले देशों में अंग्रेज और फ्रेंच या डच और पुर्तगालियों को देख लें। लड़ते आपस में वो भी थे। मगर फिर भी उन्होंने हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में राज कर ही लिया। क्यों ? क्योंकि हमारे राजाओं को दुश्मन से लड़ना तो आता था मगर उन्हें मारना नहीं आता था। दुश्मन जब हम पर हावी होते थे तो वो हमारे गांवों-शहरों को आग लगा देते थे, विरोधियों को बीच चौराहे में सूली पे चढ़ा देते थे, उन्हें तोप के आगे बाँध कर उड़ा देते थे। मगर हम ऐसा नहीं करते थे। और इसी कमी को बाबर ने भी पहचाना था जिसका उल्लेख 'बाबरनामा' में किया गया है। उसने कहा था कि " हिन्दू बड़े बहादुर होते हैं वो मरने से नहीं डरते। मगर उनकी बहादुरी ऐसी नहीं कि वो किसी को मार सकें। उनकी बहादुरी उनके मरने के काम आती है, मारने के नहीं "।
जब पृथ्वीराज ने गोरी को हराया तब गोरी को खत्म करके अगर अफगानिस्तान, जहां से वो गोरी आया था उसे अपने साम्राज्य में मिला लेता और उस गोरी को काबुल के किसी चौराहे में लटकाने के बाद पूरे अफगानिस्तान में जहाँ भी उसके खिलाफ आवाज उठती वहां आग लगा देता तो बाद में न तो उसे गोरी का हमला झेलना पड़ता और न ही दिल्ली की सत्ता किसी नीच के हाथ में जाती। और अफगानिस्तान में पृथ्वीराज का हमला आने वाले दुश्मनों के लिए भी चेतावनी का काम करता। दुश्मन इस बात को अच्छी तरह समझ जाते कि भारतीय पहले तो मारते नहीं और जब मारते हैं तो  फिर छोड़ते नहीं। मगर अफ़सोस पृथ्वीराज चौहान ने ऐसा नहीं किया। हाँ मगर गोरी ने ऐसा ही किया। और नतीजा हम सबके सामने है। हमें सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों से अपनी आजादी के लिए लड़ना पड़ा। कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। अब जो अपने इतिहास से सबक सीख लेते हैं उनका तो कल्याण हो जाता है मगर जो नहीं सीखते वो इतिहास को फिर से दोहराते हुए देखते हैं।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

थोड़ी असहिष्णुता भी है जरूरी।

हमारे लिए सहिष्णुता जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी असहिष्णुता भी है। कहते हैं जरूरत से ज्यादा कोई भी चीज ठीक नहीं होती। और हर चीज थोड़ी-थोड़ी होनी भी जरूरी है। देश की आजादी के समय हमने देश के विभाजन की मांग करने वालों के खिलाफ यदि असहिष्णुता का परिचय दिया होता तो हमारी इस पवित्र भूमि का विभाजन नहीं होता। और ना ही आज हमारी ही भूमि के टुकड़े में खड़ा पाकिस्तान हमारी नाक में दम करता। अब ये मत कहना कि अगर हम असहिष्णुता दिखाते तो हमारे देश में गृह युद्ध हो जाता। क्यों कि इतना समझ लो कि नाम आप भले ही उसे गृह युद्ध का न दो मगर सच्चाई यही है कि उस समय सहिष्णुता के रास्ते पर चलने पर भी लोगों का कत्लेआम वैसा ही हुआ था जैसा गृह युद्ध में होता है। लाशें तो गिरनी ही थी और गिरी भी। मगर हम थोड़ी असहिष्णुता दिखाते तो देश का विभाजन नहीं होता। इसलिए ये जरूरी है कि सहिष्णुता के साथ-साथ कभी-कभी हम असहिष्णुता का भी परिचय दें। मगर हमें ध्यान रखना चाहिए कि इन दोनों के बीच हम कैसे संतुलन बनाए रख सकते हैं। हमें इतना भी असहिष्णु नहीं होना चाहिए कि कल को कोई रत्नाकर डाकू अगर ऋषि वाल्मीकि बनना चाहे तो समाज उसे स्वीकार न करें। मगर हमारे अंदर इतनी सहिष्णुता भी नहीं होनी चाहिए कि मुस्लिम आक्रमणकारी हमारे ऊपर हमला करके हम पर ही राज करने लगे और उसके बाद हमें ही भाई-चारे का पाठ पढाने लगे और हम सहिष्णुता के साथ उनके प्रवचन सुनते रहें। हमारे अंदर इतनी असहिष्णुता भी नहीं होनी चाहिए कि समाज की रूढ़िवादियों के खिलाफ उठने वाली भगवान् बुद्ध और महावीर स्वामी की आवाज को भी दबा दिया जाए मगर इतनी सहिष्णुता भी नहीं होनी चाहिए कि कोई मैकाले या उसके जैसे अंग्रेज हमारी संस्कृति को ही रूढ़िवादी बता दें और हमारी संस्कृति को नीचा दिखाती शिक्षा हमें दें तो हम भी उनकी दी हुई शिक्षा में पी.एच.डी. करने लग जाएं। हमें इतना असहिष्णु भी नहीं होना चाहिए कि खजुराहो के मंदिरों में हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न मूर्तियां हमें क्रोधित कर दें मगर हमें इतना भी सहिष्णु नहीं होना चाहिए कि कोई भी एम. एफ. हुसैन सरीका अपना मुंह उठाके हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीर बानाने लगे और हम उसे चुप-चाप बर्दाश्त कर लें। हमें इतना भी असहिष्णु नहीं होना चाहिए कि पारंपरिक हिन्दू मान्यताओं का विरोध करने वाले स्वामी दयानंद को हम गालियां देने लगें मगर इतना भी सहिष्णु नहीं होना चाहिए कि वामपंथियों द्वारा अपनी राजनैतिक दुकान चलाने के लिए जब वो हिन्दू मान्यताओं और प्रतीकों का अपमान करने लगें तो हम चुप-चाप उसे भी स्वीकार कर लें। हमारे देश के लिए असहिष्णुता नहीं बल्कि हमें कब सहिष्णु होना है और कब असहिष्णु इसकी समझ विकसित करना सबसे बड़ी चुनौती है। हमें सहिष्णुता का परिचय देना है या असहिष्णुता का इसका फैसला करने से पहले समझ लेना चाहिए कि हमारी आलोचना करने वाले का उद्देश्य क्या है ? उसकी मानसिकता क्या है ? वो कौन है और वो क्या है ? क्यों कि हम ज्यादा ही सहिष्णु होने लगे तो दमन का शिकार होंगे और ज्यादा ही असहिष्णु होने लगे तो खुद ही अत्याचारी और रूढ़िवादी बनने लगेंगे। 

सोमवार, 14 सितंबर 2015

हिंदी का प्रभाव या प्रभावशालियों की हिंदी

हिंदी की चिंता करने वाले अक्सर हिंदी भाषा के विकास के लिए अंग्रेजी को खतरा मानते हैं। उन्हें लगता है कि अंग्रेजी ने हिंदी का नाश कर दिया है। आज माहौल ऐसा हो गया है कि लगभग हर आदमी ये मानता है कि हमें यदि अपना विकास करना है तो अंग्रेजी आनी जरूरी है। हिंदी में किसी को अपना भविष्य नजर नहीं आता। हिंदी उपेक्षित होती जा रही है और अंग्रेजी को एक प्रभावशाली भाषा के रूप में देखा जा रहा है। आज हाल ये हो गया है कि आप किसी सभा में उल्टी-सीधी कैसी भी हिंदी बोल लीजिये किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता मगर अंग्रेजी का एक वाक्य भी आप गलत उच्चारण कर दें तो आप भरी सभा में उपहास के पात्र बन जाएंगे। ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इसलिए होता है क्यों कि सामान्य लोग हमेशा प्रभावशाली लोगों का अनुसरण करते हैं फिर चाहे वो प्रभावशाली लोग हमारे नेता हों, फ़िल्मी सितारे हों या हमारे चहेते खिलाड़ी। हम उन्हीं की तरह खाते-पीते हैं, उन्हीं की तरह पहनते हैं, उन्हीं की तरह सोचने की कोशिश करते हैं यानि हम उन्हीं की तरह बनना चाहते हैं जिनका हम पर प्रभाव है। इसीलिये हम उनका अनुसरण करने लगते हैं। पहले हमने अंग्रेजी इसलिए सीखी क्यों कि तब इस देश में अंग्रेजों का राज था और वो प्रभावशाली थे। इसलिए उनका अनुसरण करते हुए हमने अंग्रेजी सीखी। और आज अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी का महत्व बढ़ता जा रहा है तो उसके लिए भी सबसे महत्वपूर्ण कारण यही है कि प्रभावशाली लोग आज भी अंग्रेजी में बात करते हैं। और उन प्रभावशाली लोगों का सामान्य लोग अनुसरण करते हैं। पहले अंग्रेज प्रभावशाली थे जो अंग्रेजी में बात करते थे और अब हमारे लोग प्रभावशाली हैं जो अंग्रेजी में बात करते हैं। आज हिंदी के सम्मान के लिए और उसकी प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित करने के लिए सरकारें हिंदी दिवस जैसे तमाम हथकंडे अपनाती है मगर सच्चाई ये है कि इस प्रकार के कार्यक्रम बस सरकारी खानापूर्ति के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं। हिंदी को प्रभावशाली भाषा के रूप में तब तक नहीं देखा जाएगा जब तक प्रभावशाली लोग हिंदी में ही अपनी बात रखना शुरू नहीं कर देते। भाषा स्वयं को मात्र अभिव्यक्त करने का माध्यम होती है समाज में वो सम्मानित और प्रभावशाली नजर से देखी जाएगी या नहीं ये निर्भर करता है कि वो किस वर्ग की भाषा है। अब अंग्रेजियत की संस्कृति में पले-बढे लोगों से तो उम्मीद करना ही व्यर्थ है कि वो हिंदी में बात करें मगर दुःख होता है जब हिंदी बोलने वाले लोग हिंदी बोल बोलके बड़े आदमी तो बन जाते हैं मगर बड़ा आदमी बनते ही पता नहीं उन्हें हिंदी बोलने में शर्म आने लगती है या वो ज्यादा ज्ञानी हो जाते हैं और वो अंग्रेजी में बात करने लगते हैं।
एक उदाहरण देखिये ; वीरेंद्र सहवाग और इसी क्रम में धोनी को भी ले लें, जब इनका अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में नया-नया प्रादुर्भाव हुआ था तब खेल ख़त्म होने के बाद उनसे उनकी खेल रणनीतियों से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते थे तब वो सारा ज्ञान हिंदी में देते थे। क्यों कि तब उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी, मगर बाद में उन्हें अंग्रेजी आने लगी और कुछ समय बाद दिखाई दिया कि उनसे पूछे जाने वाले प्रश्नों का जवाब वो अंग्रेजी में देने लगे। अब यही बात समझ में नहीं आती है कि जब हिंदी बोलते-बोलते उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में जगह बना ली है तो अब हिंदी बोलने में संकोच क्यों ? हिंदी के कारण उनकी प्रगति में कोई बाधा नहीं हुई तो अब हिंदी बोलने में क्या समस्या हो रही है ? अब कृपया ये तर्क ना दिया जाए कि दूसरे देश के लोगों को भी उनकी बात समझ में आ जाए इसलिए वो अंग्रेजी में कहते थे। क्योंकि तब ये पूछा जा सकता है कि जब वो शुरू-शुरू में हिंदी में कहते थे तब क्या दूसरे देश के लोगों को उनकी बात समझ में नहीं आती थी ? उन्हें हिंदी समझ में नहीं आती थी तो वहां के तमाम टेलीविज़न चैनलों के पास उसके अंग्रेजी अनुवाद की व्यवस्था होती है। और वैसे भी प्रश्न दूसरे देश के लोगों की चिंता का नहीं है, प्रश्न है अपनी भाषा के सम्मान का। और निश्चित रूप से ये कहा जा सकता है कि जब तक हम अपना सम्मान करना नहीं सीखेंगे तब तक हम अपनी भाषा-संस्कृति का सम्मान नहीं कर सकते। यही बुरा हाल हमारे फ़िल्मी सितारों का भी है। जिन फिल्मों से उन्हें नाम, पैसा और सब कुछ मिलता है वो फ़िल्में हिंदी में बनती हैं। मतलब ये कि वो आज जो कुछ भी हैं हिंदी की वजह से हैं। मगर जब पत्रकार उनसे हिंदी में प्रश्न पूछते हैं तो उनके जवाब हिंदी में कम अंग्रेजी में ज्यादा होते हैं। फ़िल्में बनाते समय तो वो फटाफट हिंदी बोलते हैं मगर ऐसा लगता है जैसे फिल्मों के बाहर शायद उन्हें हिंदी बोलने में शर्म आने लगती होगी।
ऐसे में अब हिंदी के मान-सम्मान की जिम्मेदारी उन हिंदी बोलने वाले लोगों के ऊपर आ जाती है जो आज तो सामान्य जीवन जी रहे हैं मगर कल वो समाज में प्रभावशाली स्तर को प्राप्त करेंगे। उन्हें ये तय करना होगा कि उस समय भी वो हिंदी में ही बात करेंगे। तभी ये उम्मीद की जा सकती है कि समाज में हिंदी को भी प्रभावशाली नजरों से देखा जाएगा।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण : क्या था क्या हो गया ?

अच्छे - खासे पढ़े - लिखे और खाते - पीते पटेल समुदाय के कुछ लोग गुजरात में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। और न केवल मांग कर रहे हैं बल्कि सरकार को धमका भी रहे हैं। कल तक जाट और गुर्जर आरक्षण की मांग कर रहे थे और अब ये पटेल शुरू हो गए हैं। दरअसल इन लोगों ने आरक्षण जैसे विषय को मजाक बनाके रख दिया है। जिसके मन में आता है मुँह उठा के आ जाता है आरक्षण मांगने। जब देश आजाद हुआ था तब संविधान बनाने वालों ने देश में दलितों और पिछड़ों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए नौकरियों और शिक्षा में उनके लिए कुछ जगह आरक्षित की थी और ऐसा केवल इसलिए नहीं किया गया कि उस समय वो बहुत पिछड़े हुए थे बल्कि इसलिए किया गया था क्यों कि उस समय तक और काफी हद तक अभी भी समाज के लोगों में उन दलितों और जनजातियों के प्रति समानता का भाव नहीं था। उनका शोषण किया जाता था, उनके साथ भेदभाव किया जाता था, उन्हें कई अधिकारों से वंचित रखा जाता था। संविधान निर्माताओं को आशंका थी कि यदि इन दलितों और उपेक्षितों को समाज के भरोसे छोड़ दिया गया तो समाज का प्रभावशाली वर्ग उन्हें कभी आगे नहीं बढ़ने देगा। इसलिए उन दलितों और उपेक्षितों को आरक्षण देकर ये सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि वो भी समाज के साथ - साथ आगे बढ़ें और सम्मान के साथ जीवन जिएं। अब पटेल समुदाय के कुछ लोग या उनके जैसे अन्य जातियों या समुदाय के लोग जो आज आरक्षण की मांग करते हैं क्या समाज में वो भी भेदभाव का शिकार हुए हैं या समाज में प्रगति करने के लिए किसी ने उन्हें कभी रोका ? नहीं। तो फिर उन्हें आरक्षण क्यों ? केवल इसलिए कि उन्हें लगता है कि वो पिछड़ रहे हैं और हजारों की संख्या में सड़कों में उतरकर वो सरकार को धमका सकते हैं। अगर मात्र पिछड़ना ही आरक्षण का मापदंड होगा तो शायद पूरे देश को आरक्षण देना पड़ जाएगा। क्यों कि देश के लगभग हर नागरिक को ये लगता है कि वो पिछड़ गया है। ये लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र है और जितनी जल्दी ये परंपरा ख़त्म हो जाए उतना देश और समाज के लिए अच्छा है।

और अंत में :- आज जिस गुजरात में पटेलों के आरक्षण की मांग उठ रही है, देश की आजादी के समय उसी गुजरात की जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय करवाने वाले जो उस समय के गृह मंत्री थे वो सरदार बल्लभ भाई भी पटेल थे और उसी गुजरात की जिन मुख्यमंत्री के कार्यकाल में ये मांग उठ रही है वो आनंदी बेन भी पटेल हैं। फिर भी कुछ पटेलों को लगता है कि उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए।

रविवार, 9 अगस्त 2015

क्या हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हार रहे हैं ?

टेलीविजन चैनलों में दिखाई दिया कि आतंकी नावेद पकड़ा गया है। उसे सुरक्षाबलों ने घेरा हुआ है, उसके हाथ बंधे हुए हैं और वो मुस्कुरा रहा है, उसके चेहरे पर कोई शिकन, कोई चिंता, कोई डर के भाव नहीं दिख रहे हैं। वो दुश्मनों से घिरा होने के बावजूद एक सूरमा की तरह शान से खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। और ये हमारी आतंक के खिलाफ सबसे बड़ी हार है। दरअसल उसके बयान और उसकी मुस्कुराहट कुछ और नहीं बस हमें हमारी औकात बता रही है। उसका ये बेख़ौफ़ अंदाज मानो हमसे कह रहा हो कि तुम्हें जो उखाड़ना है उखाड़ लो हम तुम्हे पहले भी बजाते आये हैं और आगे भी बजाएंगे। और ये कोई पहली बार की घटना नहीं है जब कोई आतंकी हमें हमारी औकात बता रहा हो। इससे पहले हमें याद है जब भटकल पकड़ा गया था तो वो मीडिया के सामने अपनी उंगलियों से इंग्लिश के v का निशान दिखा रहा था जिसका इंग्लिश में मतलब होता है victory यानि जीत। मतलब गिरफ्तार होने के बाद भी उसका हौंसला बुलंद है और उसकी अकड़ कम नहीं हुई है।
             अब ये सब घटनाएं जो हमें हमारी औकात बता रही हैं दरअसल उसके लिए हमारे सुरक्षाबल ही जिम्मेदार हैं जब भटकल मीडिया के सामने उँगलियाँ दिखाकर विजय का निशान बना रहा था तभी उसकी दोनों उँगलियाँ क्यों नहीं तोड़ी गई ? जब वो नावेद हमारे जवानों की गिरफ्त में होने के बावजूद मुस्कुरा रहा था तो उसके हाथ - पैर क्यों नहीं तोड़े गए ? चलो मान लेते हैं कि इन आतंकियों से और अधिक जानकारी पाने की एक कूटनीतिक मजबूरी हो सकती है जिस कारण हमारे जवान इनके इस दुस्साहसी व्यवहार का उसी समय मुँहतोड़ जवाब नहीं दे पाते। मगर बाद में ? बाद में तो ये पवित्र कार्य किया जा सकता है। अपने काम की जानकारी पाने के बाद तो भटकल की टूटी हुई उँगलियाँ मीडिया के सामने दिखाई जा सकती थी। मगर ऐसा नहीं हुआ और नावेद के मामले में भी शायद ऐसा नहीं होगा। हमारे नेता और जवान आतंक के खिलाफ बस बयान ही देते रहेंगे और वो हमें हमारी औकात बताते रहेंगे।
               हमें इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि चंद आतंकियों को फाँसी दे देने से हम आतंक के खिलाफ लड़ाई जीत जाएंगे। वो हमारे दस लोगों को मार देंगे, हम उनके चार आतंकी मार देंगे। इस तरह भेड़ - बकरियों की तरह लड़ कर ये जंग नहीं जीती जा सकती। एक बात हम सभी को अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि ये पारंपरिक जंग नहीं है ये आतंक की लड़ाई है और इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है इसका फैसला इस बात से होगा कि आतंकित कौन है ? वो या हम ? अब देखा जाए तो साफ़ दिखता है कि वो हमें डराने में कामयाब होते जा रहे हैं। आज आप कोई सरकारी काम कराने जाइए पहले जहाँ दो कागजों मे आपकी पहचान प्रमाणित हो जाती थी वहीँ आज आपको दस तरह के कागज लगाने पड़ते हैं। अब आप आप ही हो ये प्रमाणित करने के लिए दस कागजों के लिए आपको दस जगह चक्कर भी लगाने पड़ते हैं। आखिर परेशान कौन हुआ ? आप ही ना। और ये सब क्यों होता है ? ताकि अच्छी तरह से ये जांच लिया जाए कि आप आप ही हो कोई आतंकी नहीं। जब आतंकवाद इतना नहीं फैला था तब दो कागज में आसानी से काम हो जाता था आज आतंकवाद इतना फ़ैल गया है तो आपको कोई भी काम करने के लिए यहाँ - वहां भागना पड़ता है। तो सोचो कौन जीता आतंकी या हम ? और यही नहीं देश में कोई त्यौहार आता है तो हमारा सुरक्षा तंत्र एकदम से घबराने लगता है। कहीं हाई अलर्ट जारी हो जाता है तो कहीं सड़के बंद कर दी जाती हैं। माहौल में एक अजीब सी बैचेनी, एक तनाव पैदा कर दिया गया है। और ये सब इसीलिये हो रहा है क्योंकि हम आतंकित हैं। पलड़ा उनका भारी होता जा रहा है।

रविवार, 19 जुलाई 2015

क्या हम दक्षिण से कुछ सीख सकते हैं ?

हम उत्तर भारतीय लोगों को दक्षिण भारतीयों से बहुत कुछ सीखना चाहिए। हमने तो पश्चिमी संस्कृति का अंधाधुंध अनुसरण किया ये सोचकर कि इससे हम पश्चिम के लोगों की तरह ही होशियार हो जाएंगे और उनकी तरह हमारा भी विकास तेजी से होने लगेगा। पश्चिम की नक़ल करते - करते हम अपनी भाषा और संस्कृति से कटते चले गए। जब कि हमारी तुलना में दक्षिण भारतीयों ने पश्चिम का ऐसा अंधा अनुसरण नहीं किया। वो आज भी अपने राज्यों की संस्कृति का सम्मान हम उत्तर भारतीयों से ज्यादा करते हैं और राज्य ही क्यों अपने देश की संस्कृति की शुद्धता को वास्तव में उन्होंने ही बचा कर रखा हुआ है। उन्होंने हमारी तरह भाईचारे और उदारवाद का ढोंग करते हुए अपनी संस्कृति का बेड़ा गर्क नहीं किया। चाहे तो उनके पहनावे को देख लें, खान - पान को देख लें या उनकी फिल्मों को देख लें। हर जगह भारतीय संस्कृति की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। वो हमारी तुलना में अपनी संस्कृति का पालन ज्यादा करते हैं। मगर हम उत्तर भारतीयों ने अपनी भाषा, पहनावा और कला का नाश मारके रखा हुआ है। और ये हरकतें हम उदारवादी और बड़ी सोच के नाम पर करते हैं। अब भाषा का ही उदाहरण देख लें, हम कहने को तो हिंदी बोलते हैं मगर वास्तव में क्या हम हिंदी ही बोलते हैं ? नहीं ! हम बोलते हैं खिचड़ी भाषा। थोड़ी तुर्की, थोड़ी अरबी, थोड़ी फ़ारसी, थोड़ी पुर्तगाली और पता नहीं क्या - क्या मिलाकर एक घोल तैयार कर दिया। और कहते हैं इसे हिंदी। और मजेदार बात तो ये कि उन दक्षिण भारतीय लोगों से भी हम अपेक्षा करते हैं कि एक भारतीय होने के नाते हमें एक भाषा का प्रयोग करना चाहिए। हम सभी को हिंदी का प्रयोग करना चाहिए। अरे भई पहले खुद तो ढंग से हिंदी बोलो। उसके बाद उन्हें ज्ञान देना। अब पता नहीं इस तरह अपनी भाषा - संस्कृति को चौपट करके हमने कितना विकास किया होगा। अगर विकास की बात करें तो अपनी संस्कृति का अनुसरण करते हुए भी दक्षिण भारतीय हमसे ज्यादा विकसित हैं। चाहे कला की बात कर लो चाहे विज्ञान की। हर और उनका ही डंका बज रहा है। कला की यदि बात करें तो कला के जिस रूप से हम सभी सामान्यतः परिचित हैं वो है फ़िल्म। अब फिल्मों को ही देख लें, दक्षिण की फ़िल्में बॉलीवुड की फिल्मों से ज्यादा कलात्मक और तकनीकी रूप से दमदार होती हैं। और यही नहीं बॉलीवुड में भी दक्षिण भारतीय फ़िल्म निर्माताओं ने अपनी धाक जमाई है। और अगर विज्ञान की बात करें तो हम सभी को पता है कि देश में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक उपलब्धियां दक्षिण के ही नाम रही हैं। ऐसे ही नहीं वहां इसरो का मुख्यालय बना और न यूं ही नहीं वह इंजीनियरों का गढ़ बना। 

शुक्रवार, 26 जून 2015

सयुंक्त राष्ट्र संघ की सार्थकता पर उठते सवाल

लखवी मामले में चीन के रुख से एक बार ये फिर सिद्ध हो गया है कि सयुंक्त राष्ट्र संघ और उसकी अन्य शाखाएं जो मानवता की भलाई का ढोल पीटते रहते हैं वो सब एक दिखावा है। प्रथम विश्व युद्ध में हुए भारी विनाश के बाद दुनिया के ताकतवर देशों ने लीग ऑफ़ नेशन का गठन किया था ताकि भविष्य में दुनिया के देशों के मध्य समन्वय स्थापित किया जा सके और उनके बीच के विवादों को शांतिपूर्वक सुलझा कर देशों के बीच किसी भी संभावित टकराव को रोका जा सके। मगर कालान्तर में लीग दुनिया के देशों का भरोसा जीतने में असफल सिद्ध हुआ और इसी कारण ये दूसरे विश्व युद्ध को होने से नहीं रोक पाया। और अब दूसरे विश्व युद्ध के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र संघ भी लीग ऑफ़ नेशन की तरह अपना भरोसा खोता जा रहा है। लीग ऑफ़ नेशन की असफलताओं से सीख लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया के तमाम देशों के द्वारा सयुंक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी मगर अफ़सोस संघ भी लीग ऑफ़ नेशन की कार्बन कॉपी बनकर रह गया है। दरअसल सयुंक्त राष्ट्र संघ की कार्यशैली हमेशा से ही संदिग्ध रही है। संघ के होने से केवल ताकतवर देशों को फायदा हो रहा है। गरीब और कमजोर देश बस यहाँ पर जी हुजूरी के लिए बने हुए हैं। इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि संघ के अंतर्गत एक सुरक्षा परिषद् है जिसके पांच स्थाई सदस्यों को वीटो शक्ति प्राप्त है। अब अगर इन पांचों देशों को किसी देश के खिलाफ कार्यवाही करनी है तो वो बिना संघ की अनुमति के या बिना संघ को भरोसे में लिए भी अपनी कार्यवाही को अंजाम दे देते हैं। मगर जब कमजोर और गरीब देश न्याय की बात करते है और किसी देश के खिलाफ कार्यवाही की बात करते हैं तो उसे मजबूर किया जाता है कि पहले वो संघ का समर्थन प्राप्त करे और ये सब वो दुनिया के अमन और शांति के नाम पर करवाते हैं। और कमजोर देश ये मान भी जाते हैं। और देखा जाए तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है बुराई है संघ के असमानतापूर्वक व्यवहार में। जब कमजोर देश सुरक्षा परिषद् में या संघ की किसी अन्य परिषद् में न्याय के लिए जाते हैं तो क्या होता है ? तब ये स्थाई सदस्य अपनी सुविधा के अनुसार फैसला करते हैं। इन्हें सही लगा तो सब एक हो जाएंगे और इनमे से किसी भी एक देश का दिमाग सनक गया तो वो अपने वीटो का प्रयोग कर देता है। कमजोर देश बस मुंह ताकते रह जाते हैं जैसे इस बार लखवी मामले में हुआ। जरूरत इस बात की है कि संघ में और उसकी किसी भी परिषद् में कोई भी फैसला लोकतान्त्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर होना चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले ये देश खुद सुरक्षा परिषद् में लोकतंत्र को लागू नहीं करते। लोकतंत्र का झुनझुना बस कमजोर देशों को बहलाने के लिये है। मतलब जब ताकतवर देशों को खुद के लिए कोई फैसला करना है तो भी फैसला वो करेंगे और जब कमजोर देशों के लिए फैसला करना है तो भी फैसला वो ही करेंगे।

आज समय आ गया है कि भारत को सयुंक्त राष्ट्र संघ में या तो नियम कायदों में बदलाव की मांग करनी चाहिए या फिर संघ से अलग हट जाना चाहिए। हम यहाँ कोई तालियां बजाने के लिए थोड़े ही बैठे हैं। संघ को समझ जाना चाहिए कि वो अपने सदस्य देशों के ऊपर कोई मेहरबानी नहीं कर रहा है। देश जुड़े हुए हैं तो संघ बना हुआ है। अगर वो समानता और बराबरी के सिद्धांत को लागू नहीं कर सकता तो उसके होने का कोई औचित्य कम से कम हमारे जैसे गरीब देशों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं है।

इससे एक कदम और बढ़कर हम ये भी कर सकते है कि दुनिया के तमाम दूसरे कमजोर देशों को साथ में लेकर कोई दूसरा संगठन खड़ा कर दें। और इसमें न तो कोई बुराई है और न ही असंभव जैसी बात है। ताकतवर देशों की लॉबी के खिलाफ पहले भी हम खड़े हुए हैं फिर चाहे शीत युद्ध के समय गुट निरपेक्ष आंदोलन का उदाहरण देख लें या फिर हाल ही में आई. एम. एफ. और विश्व बैंक की तमाम आलोचनाओं और आपत्तियों के खिलाफ जाकर ब्रिक्स बैंक के गठन का उदाहरण देख लें। भारत ने हमेशा दुनिया में अपने नेतृत्व की थोड़ी बहुत झलक दिखाई है। हमने दिखाया है दुनिया को कि हम भी नेतृत्व कर सकते हैं। बस अब जरूरत है अपने नेतृत्व को नया आयाम देने की।

और अंत में : गुलाम लोग इसलिए गुलाम नहीं होते क्यों कि उनके ऊपर कोई हुकूमत करता है बल्कि लोग जब खुद को गुलाम और कमजोर समझने लगते हैं तब उनके ऊपर कोई हुकूमत करना शुरू कर देता है। हमारे देश में और दुनिया भर के देशों में एक समय सामंतवाद क्यों फला -  फूला और क्यों अब ये सब ख़त्म हो गया ? वही कमजोर समझने वाली बात के कारण। पहले किसान लोग खुद को कमजोर समझते थे तो सामंतवाद बढ़ने लगा। और जब किसानों ने अपनी ताकत को जान कर समंतवादियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया तो सामंतवाद ख़त्म भी हो गया। 

गुरुवार, 7 मई 2015

तीन कंपनियां, तीन प्रेरक प्रसंग


मोटोरोला वो कंपनी है जिसने सबसे पहले मोबाइल फोन बनाया मगर मोबाईल बाजार में उसका प्रभाव घटते - घटते आज स्थिति यह हो गई कि वो माइक्रोसॉफ्ट के द्वारा खरीद ली गई। नोकिया वो कंपनी है जिसकी अभी कुछ वर्षों पहले तक विश्व बाज़ार में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी थी मगर फिर पिछले कुछ वर्षों में उसकी हिस्सेदारी घटती चली गई और अब वो गूगल के द्वारा खरीद ली गई है। सैमसंग वो कंपनी है जिसकी आज से दस साल पहले तक जिस समय मोबाइल कारोबार में नोकिया का डंका बज रहा था उस समय सैमसंग की मोबाइल बाज़ार में हिस्सेदारी नाममात्र थी। मगर आज सबसे ज्यादा मोबाइल फोन सैमसंग बेच रही है।
इन तीनों प्रसंगों से हमें ये सीखने को मिलाता है कि मोटोरोला की तरह किसी क्षेत्र में सबसे पहले शुरुआत करने का यह मतलब नहीं कि उस क्षेत्र में हमारा बर्चस्व बन जाएगा। और नोकिया के प्रसंग से हमें ये सीखने को मिलता है कि किसी क्षेत्र में अगर हमारा बर्चस्व बन गया है तो वो हमेशा ऐसा ही बना रहेगा ये जरुरी नहीं। सैमसंग का प्रसंग हमें सिखाता है कि यदि सही रणनीति से आगे बढ़ा जाए तो सबसे आखिरी में कदम बढ़ाने वाला भी सबसे दूर तक जा सकता है।

शनिवार, 7 मार्च 2015

डॉक्यूमेंट्री विवाद और सरकार की भूमिका

भारत सरकार ने 'इंडियाज़ डॉटर' नामक डॉक्यूमेंट्री पर प्रतिबन्ध लगा कर अपनी ओर से जांच शुरू कर दी है। बीबीसी की इस डॉक्यूमेंट्री में विवाद की मूल वजह है दिल्ली गैंग रेप के एक दोषी मुकेश का साक्षात्कार जिसमे उसने बलात्कार के लिए पीड़िता को ही दोष दे दिया। डॉक्यूमेंट्री पर यद्यपि लोगों की अलग-अलग राय भी आने लगी हैं कोई इस डॉक्यूमेंट्री के दिखाए जाने के पक्ष में है और कोई इसे प्रतिबंधित ही रखने के पक्ष में हैं। कोई यह मानता है कि इसे दिखाया जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि उनके अनुसार इससे देश में महिलाओं के प्रति कुछ लोगों की सोच कैसी है और होनी कैसी चाहिए इस पर एक बहस शुरू होगी। मगर कुछ लोग इसे एक बलात्कारी के महिमामंडन के रूप में भी देख रहे हैं और इसलिए वे इसे प्रतिबंधित रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि ऐसे घृणित लोगों की घृणित बातों का समाज के सामने आना औचित्यविहीन है। इन सब विवादों के बीच सरकार के प्रतिबंध के बावज़ूद बीबीसी ने इसका प्रसारण किया। अब पता नहीं इसके प्रसारण से दुनिया भर में भारत की छवि कितनी धूमिल हुई है मगर देश की बिगड़ी छवि के लिए कुछ हद तक सरकार भी जिम्मेदार है। इस डॉक्यूमेंट्री का बनना और उसका प्रसारण सरकार और उसके प्रशासन की नाकामी दिखाता है।
सरकार की पहली नाकामी - तिहाड़ जेल में इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने की इजाज़त कैसे मिल गई ?
दूसरी नाकामी - दोषी मुकेश जो इस डॉक्यूमेंट्री में साक्षत्कार देता है उसे मृत्युदंड दिया जाना है। वह अभी तक फांसी में क्यों नहीं लटकाया गया ? यदि मुकेश और उसके सभी दोषी साथियों को समय पर सजा दे दी जाती तो क्या वो ऐसा शर्मनाक साक्षात्कार देता ?
तीसरी नाकामी - सुना है इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने वाली निर्मात्री लेस्ले उडविन भारत छोड़ के चली गई है। अब चूंकि सरकार को इस डॉक्यूमेंट्री के बनने में नियम और कानूनों की अनदेखी की शंका है और सरकार जेल में हुए इस साक्षात्कार की इजाज़त संबंधी जांच कर रही है तो सरकार ने उस निर्मात्री के देश से बाहर जाने पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाया ?

कमाल की व्यवस्था है हमारे देश की-कभी एक वारेन एंडरसन था जिसे भोपाल गैस कांड के बाद हमारे देश से आराम से जाने दिया गया और हमें जांच के नाम का झुनझुना पकड़ा दिया गया। कभी कोई इटली के नाविक थे जो हमारे मछुआरों को गोली मार देते हैं और फिर हमारी सरकार और न्यायपालिका को वापिस लौटने का आश्वासन देकर वापस अपने देश चले जाते हैं। और फिर तय समय पर वापस आने से मुकर भी जाते हैं। सरकार ने उस समय भी लगभग अपने हाथ खड़े कर दिए थे। वो तो देश में और खासतौर पर केरल में जहाँ से वो मछुआरे सम्बंधित थे वहां उठे राजनैतिक और सामाजिक दबाव ने सरकार को मजबूर कर दिया तब जाकर वो नौसैनिक भारत बुलाए गए वो भी सरकार द्वारा इटली की सरकार को जब आश्वासन दिया गया कि उन नौसैनिकों को मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा। और अब ये बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री बनाने वाली लेस्ले उडविन हैं। इस पूरे प्रकरण की जांच का झुनझुना बजने लगा है और वो भी देश छोड़ के इंग्लैंड चली गई।

बहरहाल इन सभी नाकाम बातों के इतर आप सभी को 'अंतराष्ट्रीय महिला दिवस' की शुभकामनाएं ।।