बुधवार, 16 दिसंबर 2015

केवल जीतना महत्वपूर्ण नहीं, जीत का लाभ उठाना भी जरूरी है।

हमने पाकिस्तान को चार-चार युद्धों में हराया है। सिवाय 1971 में बांग्लादेश बनाने के हमारे पास पाकिस्तान पर जीत की कोई और विशेष उपलब्धि नहीं दिखाई देती। उपलब्धि से मतलब है कि बाकी के युद्धों में हमें पाकिस्तान पर जीत से क्या मिला ? सवाल को थोड़ा सा घुमा दिया जाए और पूछा जाए कि अगर इनमें से एक भी युद्ध पाकिस्तान जीत जाता तो उसे क्या मिलता ? पाकिस्तान यदि जीत जाता तो यकीनन वो भारत के किसी न किसी हिस्से में कब्जा कर लेता और हम बस देखते ही रह जाते। मगर जीतने के बाद भी हम पाकिस्तानी जमीन पर कोई कब्ज़ा नहीं कर पाए हैं। इस मामले में देखा जाए तो पाकिस्तान की रणनीति हमसे बेहतर है। उसे हार के भी कुछ नहीं खोना पड़ता और हमें जीत कर भी कुछ नहीं मिलता। अब आप सोचोगे पाकिस्तान हमसे कैसे जीत जाएगा ? तो भैया पाकिस्तान हमसे वैसे ही जीत जाएगा जैसे मुहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान से जीता था। औकात पाकिस्तान की भी कुछ नहीं है और औकात उस मुहम्मद गोरी की भी कुछ नहीं थी। बस पृथ्वीराज चौहान और उसमे एक ही फर्क था कि गोरी को पता था उसे क्या चाहिए और पृथ्वीराज चौहान हम लोगों की तरह हवा में रहता था। तराईन के पहले युद्ध में जब पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को हरा दिया था तब उसे जिन्दा छोड़ दिया। मगर तराईन के दूसरे युद्ध में जब गोरी को मौका मिला उसने पृथ्वीराज को नहीं छोड़ा। और यही अब फिर से हो रहा है। हम जब जीतते हैं,  हम पाकिस्तान की जीती हुई जमीन छोड़ देते हैं मगर जिस दिन उसे मौका मिलेगा वो नहीं छोड़ेगा। हमें इतिहास में पढ़ाया जाता है कि हमारी हार का और दुश्मनों की जीत का सबसे बड़ा कारण था कि हमारे राजा आपस में लड़ते रहते थे। मगर ऐसा नहीं है, हमारी हार का सबसे बड़ा कारण था कि हमारे अंदर दुश्मनों से लड़ने की तमीज ना तो आज है और ना उस समय थी। रही बात आपस में लड़ने की तो केवल हमारे राजा ही नहीं बल्कि हमारे देश में आक्रमण करने वाले दुश्मन भी आपस में लड़ते रहते थे। फिर आप चाहे बाबर और इब्राहिम लोदी को देख लें या हुमायूँ और शेरशाह सूरी को देख लें। यही नहीं बाद में हमारे देश में राज करने वाले देशों में अंग्रेज और फ्रेंच या डच और पुर्तगालियों को देख लें। लड़ते आपस में वो भी थे। मगर फिर भी उन्होंने हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में राज कर ही लिया। क्यों ? क्योंकि हमारे राजाओं को दुश्मन से लड़ना तो आता था मगर उन्हें मारना नहीं आता था। दुश्मन जब हम पर हावी होते थे तो वो हमारे गांवों-शहरों को आग लगा देते थे, विरोधियों को बीच चौराहे में सूली पे चढ़ा देते थे, उन्हें तोप के आगे बाँध कर उड़ा देते थे। मगर हम ऐसा नहीं करते थे। और इसी कमी को बाबर ने भी पहचाना था जिसका उल्लेख 'बाबरनामा' में किया गया है। उसने कहा था कि " हिन्दू बड़े बहादुर होते हैं वो मरने से नहीं डरते। मगर उनकी बहादुरी ऐसी नहीं कि वो किसी को मार सकें। उनकी बहादुरी उनके मरने के काम आती है, मारने के नहीं "।
जब पृथ्वीराज ने गोरी को हराया तब गोरी को खत्म करके अगर अफगानिस्तान, जहां से वो गोरी आया था उसे अपने साम्राज्य में मिला लेता और उस गोरी को काबुल के किसी चौराहे में लटकाने के बाद पूरे अफगानिस्तान में जहाँ भी उसके खिलाफ आवाज उठती वहां आग लगा देता तो बाद में न तो उसे गोरी का हमला झेलना पड़ता और न ही दिल्ली की सत्ता किसी नीच के हाथ में जाती। और अफगानिस्तान में पृथ्वीराज का हमला आने वाले दुश्मनों के लिए भी चेतावनी का काम करता। दुश्मन इस बात को अच्छी तरह समझ जाते कि भारतीय पहले तो मारते नहीं और जब मारते हैं तो  फिर छोड़ते नहीं। मगर अफ़सोस पृथ्वीराज चौहान ने ऐसा नहीं किया। हाँ मगर गोरी ने ऐसा ही किया। और नतीजा हम सबके सामने है। हमें सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों से अपनी आजादी के लिए लड़ना पड़ा। कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। अब जो अपने इतिहास से सबक सीख लेते हैं उनका तो कल्याण हो जाता है मगर जो नहीं सीखते वो इतिहास को फिर से दोहराते हुए देखते हैं।

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