लखवी मामले में चीन के रुख से एक बार ये फिर सिद्ध हो गया है कि सयुंक्त राष्ट्र संघ और उसकी अन्य शाखाएं जो मानवता की भलाई का ढोल पीटते रहते हैं वो सब एक दिखावा है। प्रथम विश्व युद्ध में हुए भारी विनाश के बाद दुनिया के ताकतवर देशों ने लीग ऑफ़ नेशन का गठन किया था ताकि भविष्य में दुनिया के देशों के मध्य समन्वय स्थापित किया जा सके और उनके बीच के विवादों को शांतिपूर्वक सुलझा कर देशों के बीच किसी भी संभावित टकराव को रोका जा सके। मगर कालान्तर में लीग दुनिया के देशों का भरोसा जीतने में असफल सिद्ध हुआ और इसी कारण ये दूसरे विश्व युद्ध को होने से नहीं रोक पाया। और अब दूसरे विश्व युद्ध के बाद गठित संयुक्त राष्ट्र संघ भी लीग ऑफ़ नेशन की तरह अपना भरोसा खोता जा रहा है। लीग ऑफ़ नेशन की असफलताओं से सीख लेते हुए दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया के तमाम देशों के द्वारा सयुंक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी मगर अफ़सोस संघ भी लीग ऑफ़ नेशन की कार्बन कॉपी बनकर रह गया है। दरअसल सयुंक्त राष्ट्र संघ की कार्यशैली हमेशा से ही संदिग्ध रही है। संघ के होने से केवल ताकतवर देशों को फायदा हो रहा है। गरीब और कमजोर देश बस यहाँ पर जी हुजूरी के लिए बने हुए हैं। इस बात को इस तरह समझा जा सकता है कि संघ के अंतर्गत एक सुरक्षा परिषद् है जिसके पांच स्थाई सदस्यों को वीटो शक्ति प्राप्त है। अब अगर इन पांचों देशों को किसी देश के खिलाफ कार्यवाही करनी है तो वो बिना संघ की अनुमति के या बिना संघ को भरोसे में लिए भी अपनी कार्यवाही को अंजाम दे देते हैं। मगर जब कमजोर और गरीब देश न्याय की बात करते है और किसी देश के खिलाफ कार्यवाही की बात करते हैं तो उसे मजबूर किया जाता है कि पहले वो संघ का समर्थन प्राप्त करे और ये सब वो दुनिया के अमन और शांति के नाम पर करवाते हैं। और कमजोर देश ये मान भी जाते हैं। और देखा जाए तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है बुराई है संघ के असमानतापूर्वक व्यवहार में। जब कमजोर देश सुरक्षा परिषद् में या संघ की किसी अन्य परिषद् में न्याय के लिए जाते हैं तो क्या होता है ? तब ये स्थाई सदस्य अपनी सुविधा के अनुसार फैसला करते हैं। इन्हें सही लगा तो सब एक हो जाएंगे और इनमे से किसी भी एक देश का दिमाग सनक गया तो वो अपने वीटो का प्रयोग कर देता है। कमजोर देश बस मुंह ताकते रह जाते हैं जैसे इस बार लखवी मामले में हुआ। जरूरत इस बात की है कि संघ में और उसकी किसी भी परिषद् में कोई भी फैसला लोकतान्त्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर होना चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले ये देश खुद सुरक्षा परिषद् में लोकतंत्र को लागू नहीं करते। लोकतंत्र का झुनझुना बस कमजोर देशों को बहलाने के लिये है। मतलब जब ताकतवर देशों को खुद के लिए कोई फैसला करना है तो भी फैसला वो करेंगे और जब कमजोर देशों के लिए फैसला करना है तो भी फैसला वो ही करेंगे।
आज समय आ गया है कि भारत को सयुंक्त राष्ट्र संघ में या तो नियम कायदों में बदलाव की मांग करनी चाहिए या फिर संघ से अलग हट जाना चाहिए। हम यहाँ कोई तालियां बजाने के लिए थोड़े ही बैठे हैं। संघ को समझ जाना चाहिए कि वो अपने सदस्य देशों के ऊपर कोई मेहरबानी नहीं कर रहा है। देश जुड़े हुए हैं तो संघ बना हुआ है। अगर वो समानता और बराबरी के सिद्धांत को लागू नहीं कर सकता तो उसके होने का कोई औचित्य कम से कम हमारे जैसे गरीब देशों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं है।
इससे एक कदम और बढ़कर हम ये भी कर सकते है कि दुनिया के तमाम दूसरे कमजोर देशों को साथ में लेकर कोई दूसरा संगठन खड़ा कर दें। और इसमें न तो कोई बुराई है और न ही असंभव जैसी बात है। ताकतवर देशों की लॉबी के खिलाफ पहले भी हम खड़े हुए हैं फिर चाहे शीत युद्ध के समय गुट निरपेक्ष आंदोलन का उदाहरण देख लें या फिर हाल ही में आई. एम. एफ. और विश्व बैंक की तमाम आलोचनाओं और आपत्तियों के खिलाफ जाकर ब्रिक्स बैंक के गठन का उदाहरण देख लें। भारत ने हमेशा दुनिया में अपने नेतृत्व की थोड़ी बहुत झलक दिखाई है। हमने दिखाया है दुनिया को कि हम भी नेतृत्व कर सकते हैं। बस अब जरूरत है अपने नेतृत्व को नया आयाम देने की।
और अंत में : गुलाम लोग इसलिए गुलाम नहीं होते क्यों कि उनके ऊपर कोई हुकूमत करता है बल्कि लोग जब खुद को गुलाम और कमजोर समझने लगते हैं तब उनके ऊपर कोई हुकूमत करना शुरू कर देता है। हमारे देश में और दुनिया भर के देशों में एक समय सामंतवाद क्यों फला - फूला और क्यों अब ये सब ख़त्म हो गया ? वही कमजोर समझने वाली बात के कारण। पहले किसान लोग खुद को कमजोर समझते थे तो सामंतवाद बढ़ने लगा। और जब किसानों ने अपनी ताकत को जान कर समंतवादियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया तो सामंतवाद ख़त्म भी हो गया।
आज समय आ गया है कि भारत को सयुंक्त राष्ट्र संघ में या तो नियम कायदों में बदलाव की मांग करनी चाहिए या फिर संघ से अलग हट जाना चाहिए। हम यहाँ कोई तालियां बजाने के लिए थोड़े ही बैठे हैं। संघ को समझ जाना चाहिए कि वो अपने सदस्य देशों के ऊपर कोई मेहरबानी नहीं कर रहा है। देश जुड़े हुए हैं तो संघ बना हुआ है। अगर वो समानता और बराबरी के सिद्धांत को लागू नहीं कर सकता तो उसके होने का कोई औचित्य कम से कम हमारे जैसे गरीब देशों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं है।
इससे एक कदम और बढ़कर हम ये भी कर सकते है कि दुनिया के तमाम दूसरे कमजोर देशों को साथ में लेकर कोई दूसरा संगठन खड़ा कर दें। और इसमें न तो कोई बुराई है और न ही असंभव जैसी बात है। ताकतवर देशों की लॉबी के खिलाफ पहले भी हम खड़े हुए हैं फिर चाहे शीत युद्ध के समय गुट निरपेक्ष आंदोलन का उदाहरण देख लें या फिर हाल ही में आई. एम. एफ. और विश्व बैंक की तमाम आलोचनाओं और आपत्तियों के खिलाफ जाकर ब्रिक्स बैंक के गठन का उदाहरण देख लें। भारत ने हमेशा दुनिया में अपने नेतृत्व की थोड़ी बहुत झलक दिखाई है। हमने दिखाया है दुनिया को कि हम भी नेतृत्व कर सकते हैं। बस अब जरूरत है अपने नेतृत्व को नया आयाम देने की।
और अंत में : गुलाम लोग इसलिए गुलाम नहीं होते क्यों कि उनके ऊपर कोई हुकूमत करता है बल्कि लोग जब खुद को गुलाम और कमजोर समझने लगते हैं तब उनके ऊपर कोई हुकूमत करना शुरू कर देता है। हमारे देश में और दुनिया भर के देशों में एक समय सामंतवाद क्यों फला - फूला और क्यों अब ये सब ख़त्म हो गया ? वही कमजोर समझने वाली बात के कारण। पहले किसान लोग खुद को कमजोर समझते थे तो सामंतवाद बढ़ने लगा। और जब किसानों ने अपनी ताकत को जान कर समंतवादियों के खिलाफ विद्रोह कर दिया तो सामंतवाद ख़त्म भी हो गया।
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