शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

काल्पनिक कहानियां उतनी भी काल्पनिक नहीं होतीं जितनी हम समझते हैं।

 पुरानी कहावत है कि 'धुआँ वहीं उठता है जहां कुछ सुलग रहा हो।'.... इसलिए हम ये कह सकते हैं कि काल्पनिक कहानियां उतनी भी काल्पनिक नहीं होतीं जितनी हम समझते हैं।.... मतलब ये कि अजीब से अजीब काल्पनाओं का भी कहीं न कहीं ठोस आधार जरूर होता है।

जैसे हम बॉलीवुड की कोई बेहतरीन फिल्म देख कर उसके लेखक की प्रशंसा करते हैं कि किस प्रकार उन्होने अपनी कल्पनाओं से एक बेहतरीन कहानी लिखी।..... लेकिन फिर पता चलता है कि बॉलीवुड की कितनी ही 'महान' फिल्में तो हॉलीवुड फिल्मों की नकल है।.... फिर तो असल प्रशंसा के पात्र हॉलीवुड के लेखक हैं।.... तो हॉलीवुड के लेखक क्या वाकई में इतने कल्पनाशील होते हैं !!.... नहीं।.... हॉलीवुड की भी बहुत सी फिल्मों मे बताया जाता है कि ये फलां-फलां उपन्यास पर आधारित है।.... इसका मतलब असल प्रशंसा उस उपन्यास के लेखक की होनी चाहिये।.... तो क्या वो उपन्यास का लेखक इतना कल्पनाशील है !!.... अब अगर उपन्यास के लेखक से पूछा जाता है तो अक्सर वो यही बताते हैं कि इस काल्पनिक कहानी की प्रेरणा उन्हें किसी सत्य घटना से मिली है।.... यानि बॉलीवुड की उस फिल्म की काल्पनिक कहानी पूरी तरह से काल्पनिक नहीं थी, उसका ठोस आधार उपन्यास के लेखक की निजी जिंदगी के अनुभव पर आधारित था।

ये तो थी बात सामान्य काल्पनिक कहानियों की, लेकिन जब हम बात करते हैं एलियंस और पारलौकिक शक्तियों वाली अजीबोगरीब कहानियों की तो क्या तब भी हम ये कह सकते हैं कि ये एलियंस और पारलौकिक शक्तियों की कहानियां सिर्फ खोखली कल्पनाएं नहीं हैं।.... उसका भी कोई न कोई ठोस आधार होगा।

जैसे जेम्स कैमरून की फिल्म 'अवतार' जब आयी थी तो हर जगह जेम्स कैमरून की प्रशंसा हो रही थी कि किस प्रकार उस फिल्म में एक रंगबिरंगी और अजीब से पेड़-पौधों वाले ग्रह 'पैंडोरा' की कल्पना की गई थी।

लेकिन जेम्स कैमरून की ये अजीबोगरीब दुनिया क्या वाकई में पूरी तरह से काल्पनिक थी ?.... इसका जवाब है नहीं।.... 

अवतार फिल्म में 'हवा में लटके पहाड़' चीन के 'झांगजियाजी नेशनल पार्क' जैसे दिखते हैं।

'आत्माओं वाले पेड़' की रंगीन लताओं की तरह ही जापान के आशिकागा फ्लावर पार्क के विस्टेरिआ पेड़ की लताएं भी विभिन्न रंगों के साथ चमकती हैं।

पेंडोरा के रंगीन जंगलों की तरह हकीकत में न्यूज़ीलैंड के 'वाईटोमो ग्लोवॉर्म गुफा' दिखती है।

इन सबके अलावा 'अवतार' फिल्म के जीवों का नीला रंग भगवान विष्णु के नीले रंग से प्रेरित होकर लिया गया था, वो भगवान विष्णु जो पौराणिक कथाओं के अनुसार समय-समय पर धरती पर अवतार लेते हैं।.... भगवान विष्णु के अवतारों से प्रेरित होकर ही फिल्म का नाम अवतार रखा गया था।

इसका मतलब अवतार फिल्म पूरी तरह से जेम्स कैमरून के दिमाग की कल्पनाएं नहीं थीं, या तो उन जगहों का अस्तित्व वास्तविक दुनिया में भी है या उस कल्पनिक कहानी का स्रोत कहीं और था।

अब अगर इस बात को मान लिया जाए कि "काल्पनिक कहानियां उतनी भी काल्पनिक नहीं होती.... उसका कोई ठोस आधार होता है" तो ये बात मेरे जैसे अनीश्वरवादी व्यक्ति को कुछ बैचैन करती है।.... दुनिया भर में होने वाली क्रूरता के बारे मे जान कर मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई भगवान जैसी चीज है।.... मुझे यही लगता है कि अपने अस्तित्व की शुरुआत में ही जब मनुष्य को कुछ समझ नहीं आया होगा, जब वो खुद को असहाय मानता रहा होगा तब उसने किसी ऐसे सर्व शक्तिमान की कल्पना की होगी जो उसे सारे संकटों से उबार लेगा।.... और उस सर्व शक्तिमान को उसने भगवान या ईश्वर नाम दे दिया होगा।.... उस पर भरोसा करके मनुष्य को कुछ हिम्मत भी मिली होगी इसलिये पीढी दर पीढी भगवान की उपासना करना और उस पर यकीन करना हमारे संस्कारों में मिल गया होगा।

वैसे ईश्वर को मानने वाले लोग अक्सर ये घिसा-पिटा तर्क देते हैं कि "इतना बड़ा ब्रह्माण्ड ऐसे ही तो बना नहीं होगा !!.... इसे किसी न किसी ने तो बनाया ही होगा !!".... अगर ऐसा है तो फिर सवाल उठता है कि भगवान को किसने बनाया ?.... तो फिर वो कहते हैं कि "भगवान खुद ही बने हैं।".... तो भगवान खुद बन सकते हैं तो ब्रह्माण्ड खुद क्यों नहीं बन सकता ?.... ये ठीक है कि ब्रह्माण्ड एक ऊर्जा से बना है लेकिन उस ऊर्जा की हम पूजा करने लग जाएं ये सोच कर कि इससे वो ऊर्जा हमारे ऊपर कृपा बरसा देगी.... ये तो हद है।

अब वैसे एक बारी के लिए ईश्वर पर यकीन किया जा सकता है लेकिन जब हम दुनिया में होने वाली क्रूरताओं को देखते हैं तो लगता है कि जिन लोगों के साथ ये क्रूरता होती हैं क्या वो ईश्वर को नहीं मानते थे ?.... या वो ईश्वर की पूजा नहीं करते थे ?.... यहां तक कि संकटों के घिरने पर भी लोग भगवान को याद करते हैं, उन्हें पुकारते हैं.... लेकिन क्या भगवान उनकी मदद करते हैं ?..... नहीं, छोटे-छोटे अबोध बच्चों के साथ भी क्रूरताएं हो जाती हैं जिन्हें न तो भगवान के बारे में पता है न शैतान के बारे में।..... इसलिये लगता है कहीं कोई भगवान नहीं है, ये सिर्फ हमारे मन की तसल्ली के लिए हमने कल्पनाएं गढ ली हैं।

लेकिन जब बात आती है कि 'कल्पनाएं हवा में नहीं होतीं, उसका कोई ठोस आधार जरूर होता है'..... तो यह बात बैचेन भी करती है कि अगर मनुष्य ने भगवान की कल्पना की थी तो क्या वो कल्पना पूरी तरह से खोखली नहीं थी ?..... क्या आदिम मनुष्य ने वास्तव में भगवान जैसे सर्व शक्तिमान का अस्तित्व महसूस किया था ?

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

यक्ष प्रश्न : पहले देश या पहले धर्म ?

सामान्यतः मुस्लिमों से पूछा जाए कि उनके लिए पहले देश है या उनका मजहब ? तो उनका सीधा और स्पष्ट जवाब होता है - पहले मजहब।
और
किसी हिन्दू को पूछा जाए कि पहले देश या पहले धर्म ? तो उसका सीधा जवाब होता है- पहले देश।

लेकिन देखा जाए तो ये इतना सीधा और सरल सवाल भी नहीं है जितना हिन्दू इसे समझते हैं, और जितनी आसानी से वो इसका जवाब दे देते हैं।..... ये एक पेंचीदा सवाल है।..... 

अभी तो चलो हालात फिर भी थोड़ा-बहुत हिन्दुओं के अनुकूल हैं तो हमारे लिए हमेशा की तरह देश-धर्म एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।.....
लेकिन मान लो कभी भारत पूरी तरह मुस्लिम बहुल बनने जा रहा हो तब आपके पास दो ही विकल्प बचेंगे।..... या तो मुसलमान बन जाओ या ये देश छोड़ कर कहीं और चले जाओ।.....
ऐसी स्थिति में आप क्या करोगे ?
क्या मुसलमान बन जाओगे ?

अगर बन गए तो हिन्दू धर्म खत्म ही हो जाएगा।
जैसे ईराक, ईरान और कभी भारत का हिस्सा रहे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से वहां का मूल धर्म खत्म हो गया।.....और आज वहां सिर्फ मुसलमान हैं।

या आप हिन्दू धर्म को बचाने के लिए ये देश छोड़ कर किसी दूसरे सुरक्षित देश में बस जाओगे ?

अगर धर्म को बचाने के लिए देश छोड़ दोगे तो उसका क्या जो आज आपसे पूछा जा रहा है कि पहले देश या पहले धर्म ?
आज आपका जवाब है पहले देश।.....
तो तब आप देश के ऊपर धर्म को महत्व क्यों दोगे ?
ये देश जिसमें हम हिन्दुओं की जड़ें हैं, जिसमें हमारे पूर्वजों का खून-पसीना मिला हुआ है ?.... जिसमें हमारा इतिहास है, जिसमें हमारी आत्मा है ? क्या आप इस देश को हमेशा के लिए छोड़ दोगे ?.....
आपको तो यहीं रहना चाहिये, अपने देश में।.... चाहे आप मुसलमान बन जाओ लेकिन रहो तो इसी देश में।

बिल्कुल एक हिन्दू के लिए फैसला करना बहुत मुश्किल है कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिये।..... क्योंकि वो अपने देश और धर्म से एक साथ जुड़ा हुआ है।.....
इनमें से एक को भी छोड़ने का सवाल उसके लिए ऐसा ही होगा जैसे उससे पूछा जाए कि बता तेरे दोनो बच्चों में से एक को बचाना है तो किसे मरने देगा ? 

ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिये, ये आपके लिए यक्ष प्रश्न है।......
या ऐसी स्थिति ही पैदा न हो, उसके लिए आपको क्या करना चाहिये...... ये भी आपके लिए यक्ष प्रश्न है।

विचार कीजिये।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

हिंदी न्यूज़ चैनलों में पत्रकारों और पत्रकारिता की बदलती तस्वीर

अगर आपसे पूछा जाए कि 'आज तक' न्यूज चैनल नम्बर 1 क्यों है ? तो अधिकतर लोगों का जवाब होगा कि उसमें बढ़िया-बढ़िया शो (चर्चा-बहस) चलते हैं।..... आज 'आज तक' की लोकप्रियता उसके शो के कारण है लेकिन 10-12 साल पहले एक समय ऐसा भी था जब 'आज तक' में एक भी शो नहीं चलता था। वो सिर्फ खबरें दिखाता था और तब भी नंबर वन था।..... ये वही समय था जब चर्चा-बहस वाले शो के लिए ndtv सबसे प्रसिद्ध था।..... आज 'आज तक' का सबसे ज्यादा जोर अपने भव्य शो के लिए रहता है ऐसा ही तब उसका सबसे ज्यादा जोर 'ब्रेकिंग न्यूज़' पर रहता था।..... कोई भी बड़ी खबर होती थी तो लोग सबसे पहले 'आज तक' देखना पसंद करते थे।..... लेकिन फिर धीरे-धीरे बहुत कुछ बदल गया। 'आज तक' ने बड़ी ही समझदारी से अपनी रणनीति बदलते हुए 'ब्रेकिंग न्यूज' के आग्रह को छोड़ते हुए चर्चा-परिचर्चा वाले शो करने शुरू कर दिए।

क्योंकि अब देश में बहुत कुछ बदलने लग गया था।..... पहले देश में 'ब्रेकिंग न्यूज़' किस बात को लेकर देखी जाती थी ? ...... या तो बम धमाकों को लेकर या साम्प्रदायिक दंगों को लेकर।..... कहीं भी खबर आती थी कि फलां-फलां शहर में आतंकियों ने बम धमाका कर दिया या किसी शहर में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए हैं। तो उसकी सबसे पहले और सबसे विस्तृत खबर 'आज तक' में देखी जाती थी।...... ये वही समय था जब टेलीविजन पत्रकारिता के बड़े-बड़े नाम राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त, रवीश कुमार, दीपक चौरसिया, विनोद दुआ जैसे लोग अपनी रिपोर्टिंग के कारण ही इतने प्रसिद्ध हुए।

और पिछले 5 सालों में तो बहुत कुछ बदल गया।.... देश के राजनैतिक और आर्थिक हालातों ने टेलीविजन पत्रकारिता को लगभग पूरा का पूरा बदल दिया।..... एक तो अब हमारे शहरों में पहले जैसे बम धमाके होने बंद हो गए हैं दूसरा न्यूज़ चैनलों को अपने आर्थिक संसाधनों को समेटना भी पड़ा है।...... हालांकि इस अर्थिक उथल-पुथल की नींव 10 साल पहले दिल्ली से बहुत दूर अमेरिका में पड़ी थी, जब 2008 में अमेरिका का 'लीमन ब्रदर्स' बैंक डूब गया था और अमेरिका सहित पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छाने लगी थी।..... इसका कुछ असर न्यूज़ चैनलों के बिज़नेस पर भी पड़ा और उन्हें अपने आर्थिक संसाधनों को समेटना पड़ा।..... ये असर अभी भी न्यूज़ चैनलों पर काफी हद तक पड़ा हुआ है।..... परिणामस्वरूप न्यूज़ चैनलों ने रिपोर्टिंग पर खर्चे कम कर दिए।..... एक तो अब देश में 'ब्रेकिंग न्यूज' के लिए कांड होने बंद हो गए हैं दूसरा तमाम रिपोर्टिंग पर खर्चा करना बेकार है।..... अब कोई चैनल 20 रिपोर्टर भी फील्ड में भेजेगा तो 20 लोगों का खर्चा उठाना पड़ेगा।..... इसलिए अब लगभग सभी चैनल 'नई खबरों' के लिए न्यूज़ एजेंसियों से ही खबरें उठाना पसंद करते हैं।..... रिपोर्टर सामान्य किस्म की रिपोर्टिंग के लिए रखे हुए हैं।...... इसीलिए अब हम देखते हैं कि लगभग सभी न्यूज़ चैनलों में एक जैसी खबरें होती हैं।

और इसके साथ ही पत्रकारों की स्थिति भी बदल चुकी है।..... पहले राजदीप, बरखा दत्त और रवीश कुमार अपनी रिपोर्टिंग के कारण प्रसिद्ध होते थे वहीं अब प्रसिद्ध होने वाले पत्रकार वो हैं जो टीवी बहस में एंकरिंग करते हैं।..... जैसे रोहित सरदाना, अंजना ओम कश्यप, मनक गुप्ता।..... आज हम किसी टेलीविजन पत्रकार को उसकी रिपोर्टिंग के लिए नहीं जानते, हम किसी को जानते हैं तो सिर्फ इसलिए कि वो फलां-फलां शो में एंकरिंग करता है।

तो इस तरह 5-10 सालों में टेलीविजन पत्रकारिता काफी कुछ बदल चुकी है।..... लेकिन एक चीज ऐसी है जो नहीं बदली। वो है टेलीविजन पत्रकारों का एजेंडा सेट करना।..... पहले पत्रकार रिपोर्टिंग करके अपना एजेंडा सेट करते थे वैसे ही एजेंडा अब एंकर चर्चा-बहसों के द्वारा सेट करते हैं।

शनिवार, 5 जनवरी 2019

पानीपत का मैदान और भारतीय जनता पार्टी

अभी कुछ समय पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा था कि "2019 का चुनाव पानीपत के युद्ध जैसा होगा।..... पानीपत का युद्ध हारने से 200 साल की गुलामी आ गई थी, वैसे ही अगर हम 2019 की लड़ाई हार गए तो हमारी विचारधारा की लड़ाई 25 साल पीछे चली जाएगी."..... अमित शाह संबोधित भले ही पार्टी कार्यकर्ताओं को कर रहे थे, मगर उनका संदेश सभी समर्थकों के लिए भी था।..... अमित शाह जहां 2019 के चुनाव को पानीपत के युद्ध की तरह चुनौतीपूर्ण और निर्णायक मान रहे हों वहीं ये भी एक संयोग है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई में जैसी स्थिति मराठों की थी, काफी कुछ वैसी स्थिति आज भाजपा ने अपने लिए बना ली है।

पानीपत में वैसे तो तीन युद्ध हुए हैं और तीनों ही युद्ध राजनीतिक दृष्टि से निर्णायक मोड़ वाले रहे हैं। लेकिन पानीपत का तीसरा युद्ध ऐसा युद्ध था जिसके बारे में हर हिंदुत्व समर्थक को जरूर जानना चाहिए।

पानीपत का तीसरा युद्ध कहने को तो मराठों और अफगानों के बीच हुआ था। लेकिन वास्तव में ये युद्ध ऐसा था जिसमें एक ओर अफगानिस्तान के मुस्लिम हमलावर, दिल्ली पर कब्जा किये हुए मुग़ल और भारत के कुछ मुस्लिम शासकों का 'महागठबंधन' था वहीं दूसरी ओर अकेले मराठा सेना थी।

हरियाणा के पानीपत में हुए इस तीसरे युद्ध की पृष्ठभूमि ऐसी थी कि सन 1760 - 61 के समय मराठा साम्राज्य पूरे भारत में सबसे शक्तिशाली और सबसे व्यापक था। जैसे 2014 के बाद से भाजपा सबसे शक्तिशाली और व्यापक थी।...... भौगोलिक दृष्टि से समझा जाए तो मराठा साम्राज्य अपने उत्कर्ष काल में महाराष्ट्र से लेकर पंजाब और उड़ीसा तक फैल चुका था।..... जिसमें आज के राजस्थान, दिल्ली और उत्तरप्रदेश के कुछ इलाके नहीं आते थे। इन इलाकों में राजपूतों, जाटों और मुसलमानों के अलग-अलग गुटों का राज था।..... आज के राजस्थान के अधिकांश भाग में राजपूतों का राज था...... मुग़ल साम्राज्य दिल्ली तक ही सिमटा हुआ था........ दिल्ली के आसपास भरतपुर, आगरा, मेरठ, रोहतक और गुड़गांव तक के इलाकों में जाटों का राज था। और यहां के जाट शासक थे सूरजमल।...... पश्चिमी उत्तरप्रदेश के रुहेलखंड (बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली का इलाका) में 'नजीब-उद-दौला' नाम के अफगान शासक का राज था।...... और लखनऊ के इलाके में नवाब 'सुजा-उद-दौला' का राज था।

अब हुआ ये कि जो मुग़ल साम्राज्य सन 1760 - 61 के समय में सिर्फ दिल्ली तक सिमट चुका था, वो मराठों की दया पर था।...... मराठे जब चाहते तभी मुग़लों के अंतिम वंशजों को मार या बंदी बनाकर मुग़ल शासन का अंत करके दिल्ली में फिर से हिन्दू राज स्थापित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।...... मराठों ने मुग़लों से संधि कर ली। इस संधि के अनुसार मुग़लों ने भारत के कई इलाकों से मराठों को टैक्स वसूलने के अधिकार दे दिया, बदले में मराठों ने मुग़लों को अभयदान दे दिया।...... हालांकि ये समझ के परे है कि अगर मराठे मुग़लों को खत्म करके दिल्ली पर अधिकार कर लेते तो क्या तब वो टैक्स नहीं वसूल सकते थे ? उन्हें मुग़लों की अनुमति की आवश्यकता ही क्या थी ?...... मगर मराठे मार खा गए कूटनीति में। उन्हें लगा समय आने पर मुग़लों की सेना और घुड़सवार दल उनके काम आएंगे।

मराठे अपना लक्ष्य भूल कर कूटनीति-कूटनीति खेलने लगे।..... जैसे इन साढ़े चार सालों में भाजपा खेलने लगी न कूटनीति-कूटनीति ; ऐसे ही।....... हमारे ये हिदुत्ववादी नेता कभी म्यांमार में मुग़ल बादशाह की मजार पर मत्था टेकते हैं तो कभी किसी विदेशी मेहमान को ताजमहल घुमाते हैं।..... लेकिन राम मंदिर पर इनको कुछ पूछो तो कानून और संविधान की दुहाई देने लगते हैं,...... बातचीत से मामले सुलझाने की बात करते हैं।...... गौरक्षकों को तो गरियाते हैं लेकिन गौहत्यारों और गौ तस्करों को कुछ नहीं बोलते।

ऐसे ही मराठे मुग़लों के साथ कूटनीति खेलने लगे।..... उधर सैकड़ों सालों से राजपूत और अन्य हिन्दू शासक इन मुस्लिम जेहादियों से लड़ कर, अपमान सह कर जैसे-तैसे इनसे मोर्चा ले रहे थे।...... और जब मराठों के रूप में हिंदुओं की शक्ति बढ़ी तो राजपूतों को मराठों से उम्मीद जागी कि अब इन मुस्लिम जेहादियों से सैकड़ों साल का हिसाब-किताब बराबर किया जा सकता है।..... जाटों ने भी मराठों को कहा था कि इन मुग़लों को खत्म कर दो।..... जैसे आज हिंदुत्ववादियों को उम्मीद थी न कि अब मोदी सरकार आ गयी है तो अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन जाएगा, ऐसे ही उम्मीद राजपूतों और जाटों को भी मराठों से जागी।....... लेकिन मराठों ने राजपूतों और जाटों को निराश कर दिया।....... शिवाजी महाराज के समय से ही मराठों का लक्ष्य था पूरे भारत में हिन्दू साम्राज्य स्थापित करना, लेकिन शिवाजी के वंशज जब अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब थे, वो तभी चूक गए।

मराठे भले ही अपना लक्ष्य भूल गए थे लेकिन मुग़ल नहीं भूले थे।...... मुग़ल भले ही मराठों के संरक्षण में रह रहे थे लेकिन वो मराठों या किसी अन्य धर्म की छत्रछाया में इस्लामिक राज कैसे बर्दाश्त कर सकते थे ! उन्हें फिर से एक मुक्कमल इस्लामिक राज स्थापित करना था।...... और यही इस्लामिक राज रुहेलखंड का नजीबुद्दौला भी चाहता था।...... इसलिए मराठों को उत्तर भारत से खदेड़ने के लिए मुग़ल और रुहेलखंड के नजीबुद्दौला ने एक गठबंधन बना लिया और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को आक्रमण के लिए आमंत्रित किया, जो पहले भी भारत पर आक्रमण कर चुका था। इसके साथ ही इन्होंने अवध के नवाब सुजाउद्दौला को भी अपने साथ मिला लिया।...... हालांकि पूर्व में मराठों ने इसी नजीबुद्दौला से अवध के राजा की रक्षा की थी।...... लेकिन 'एक इस्लामिक राज' के नाम पर अवध के नवाब मराठों के खिलाफ और गठबंधन के साथ हो गए।

इससे पहले भारत के कुछ हिस्सों में कब्जा किये हुए अब्दाली की सेना को मराठों ने पंजाब के आगे तक खदेड़ दिया था, जिससे अब्दाली मराठों से फिर से जंग लड़ने की योजना बना रहा था मगर मराठों की शक्ति के सामने खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।...... इधर मुग़ल और अन्य मुस्लिम शासक भी मराठों को खदेड़ना चाहते थे लेकिन वो भी साहस नहीं जुटा पा रहे थे।...... लेकिन जब अब्दाली, मुग़ल, नजीबुद्दौला और अवध के नवाब एक साथ हो गए तो तब शुरू हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। जिसने इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।

पानीपत के मैदान में एक ओर गठबंधन सेना थी वहीं दूसरी ओर मराठे अकेले।...... ऐसा भी नहीं है कि सारे मुसलमान मुग़लों के साथ थे। हमेशा की तरह मराठों की सेना में कई मुसलमान सैनिक भी थे।..... मराठों के तोपखाने के प्रमुख इब्राहिम गर्दी भी एक मुसलमान ही थे।...... वो भले ही मुस्लिम थे लेकिन खुद को आक्रमणकारी मुग़लों से अलग मानते थे, वो किसी इस्लामिक राज के लिए नहीं लड़ रहे थे।

पानीपत की लड़ाई में एक ओर अफगानों और मुग़लों की गठबंधन सेना थी वहीं दूसरी ओर राजपूतों और जाटों ने मराठों का साथ न देने का फैसला किया। क्योंकि जब मराठों ने समय रहते उनकी बात मान कर मुग़लों को खत्म नहीं किया तो अब उनसे सहायता की कैसी अपेक्षा !! राजपूतों और जाटों ने युद्ध से दूर रहने का फैसला कर लिया।...... एक प्रकार से उन्होंने NOTA दबा दिया।

पानीपत की भीषण लड़ाई में मराठों की हार हुई और उसके बाद मराठों का कत्लेआम शुरू हुआ।...... मराठों के साथ एक समस्या ये भी थी कि ये अपने साथ अपने परिवार लेकर भी चलते थे।..... जब मराठे हार गए तो आदमियों को तो काट दिया गया और उनकी औरतों और बच्चों को उठा लिया गया।.....  मराठे हिन्दू स्वराज का अपना लक्ष्य भूल गए थे मगर मुस्लिम शासक अपने इस्लामिक राज का लक्ष्य नहीं भूले थे।...... ये युद्ध दोपहर में ही खत्म हो गया था लेकिन मराठों का कत्लेआम आधी रात तक चलता रहा।...... हिन्दू स्वराज का सपना टूट चुका था।..... तब अपनी जान बचाकर भागते मराठा परिवारों को जाट राजा सूरजमल ने संरक्षण दिया।...... इसके बाद हालांकि मराठों ने फिर से अपनी शक्ति बढ़ाई लेकिन वो हिन्दू स्वराज स्थापित नहीं कर पाए। क्योंकि अब हालात बहुत बदल चुके थे, अब भारत में अंग्रेजों का भी वर्चस्व बढ़ता जा रहा था।

तो आज जब अमित शाह कार्यकर्ताओं को पानीपत की याद दिला रहे हैं तो अच्छा होता वो इन साढ़े चार सालों में अपने नेताओं को भी उसकी याद दिलाते रहते।...... वो नेता जो अयोध्या मसले पर मुग़लों का नाम लेने वाले मुसलमानों के साथ कूटनीति-कूटनीति खेल रहे हैं।..... इन नेताओं को इतना भी नहीं समझ में आ रहा है कि भारत में रहने वाले वो मुसलमान जो मुग़लों की तारीफ करते हैं, बाबर की मस्जिद को लेकर छाती पीटते हैं वो सब छुपे हुए जेहादी हैं।..... आज नहीं तो कल वो पलट कर हमला जरूर करेंगे, जैसे मराठों पर किया था। इन जहरीले सांपों का सिर आज ही नहीं कुचला गया तो यही सांप कल हमें डसेंगे।...... ये बात हिंदुत्ववादी लोग भाजपा को पिछले साढ़े चार सालों से समझा रहे हैं, मगर भाजपा को समझ नहीं आयी।..... मराठों को जब बोला गया था कि मुग़लों को खत्म कर दो तब मराठों को भी समझ नहीं आयी थी।...... 1761 के पानीपत में राजपूतों और जाटों ने तो मराठों का साथ नहीं दिया था, लेकिन 2019 के पानीपत में भाजपा के हिंदुत्ववादी समर्थक भाजपा का साथ कितना देते हैं और कितना नहीं ये समय के गर्भ में है। 

बुधवार, 2 मई 2018

वॉयजर : सौरमंडल के बाहर इंसानों के निशान।

इस समय हम इंसानों का एक 'दूत' हमारी पृथ्वी की तस्वीरें, इंसानों और जानवरों की आवाज की रिकॉर्डिंग हमारे सौरमंडल के पार लेकर जा चुका है। यानि ये सौरमंडल के सबसे दूर स्थित ग्रह अरुण, वरुण से भी आगे वहां जा चुका है जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुँच पता।....... इंसानों का ये दूत दुनिया की जिन-जिन भाषाओं का संदेश लेकर गया है उनमें एक हिंदी का सन्देश भी हैं।
दरअसल नासा ने हमारे सौरमंडल के बाहरी ग्रहों - शनि, बृहस्पति, अरुण और वरुण ग्रहों के अध्ययन के लिए आज से 40 साल पहले 1977 में दो अन्तरिक्षयान प्रक्षेपित किये थे। वॉयजर 1 (Voyager 1) और वॉयजर 2 (Voyager 2)...... दोनों का काम था हमारे सौरमंडल के बाहरी ग्रहों की जानकारी पृथ्वी पर भेजना और फिर अनंत अंतरिक्ष की ओर आगे बढ़ जाना। वॉयजर का इंग्लिश में मतलब होता है 'समुद्री यात्री'। जिस तरह समुद्री यात्री बहुत दूर तक यात्रा करते हैं उसी तरह नासा के ये यान भी अंतरिक्ष की अनंत यात्रा पर निकल पड़े हैं। 

इन यानों के साथ एक रोमांचक बात ये भी है कि इन यानों में एक डिस्क भी लगी हुई है। जिसमें पृथ्वी के जीव-जंतुओं की तस्वीरें, उनकी आवाजें, सौरमंडल में पृथ्वी की स्थिति की जानकारी हैं।...... क्योंकि नासा को ये सम्भावना लगी कि चूंकि इन यानों को सुदूर अंतरिक्ष में आगे बढ़ जाना था तो कभी भविष्य में ये अंतरिक्षयान किसी बुद्धिमान परग्रहीय प्राणियों के संपर्क में आ सकते हैं। इसलिए नासा ने इन यानों में एक डिस्क लगा दी जिसमें दुनिया की कई भाषाओँ में उन परग्रहियों के लिए सन्देश हैं। भारतीय भाषाओँ में हिंदी, मराठी, कन्नड़, बंगाली, उर्दू, राजस्थानी, पंजाबी में ये सन्देश रिकॉर्ड हैं। 

इस समय वॉयजर 1 पृथ्वी से लगभग 21 अरब किलोमीटर दूर हमारे सौर मंडल के बाहर जा चुका है।..... सामान्यतः जब हम सौरमंडल की बात करते हैं तो ज्यादातर को लगता है कि ये अरुण, वरुण जैसे ग्रहों तक फैला हुआ है। क्योंकि सौरमंडल की ज्यादातर तस्वीरों में हम यही देखते हैं। जब कि ऐसा नहीं है...... सौरमंडल इन ग्रहों से भी आगे तक फैला हुआ है। हमारे सभी ग्रह तो हमारे सौरमंडल का केवल 10% हिस्सा हैं। 
Voyager Location on Space / Image Courtesy : NASA

सौरमंडल यानि सूर्य का इलाका उसके चारों ओर घूमने वाले ग्रहों से नहीं बल्कि सूर्य के गुरुत्व क्षेत्र से मापा जाता है, जिसे Heliosphere कहते हैं जो कि इन ग्रहों से कई अरब किलोमीटर आगे तक फैला हुआ है। (सलंग्न चित्र में नीला भाग)..... सूर्य के गुरुत्व क्षेत्र से आगे अंतरतारकीय क्षेत्र ('इंटरस्टेलर स्पेस') (Interstellar Space) शुरू हो जाता है। (अंतरिक्ष में किसी तारे के प्रभाव क्षेत्र की सीमा से आगे की जगह को इंटरस्टेलर स्पेस कहते हैं।) इसी इंटरस्टेलर स्पेस में वॉयजर 1 जा चुका है। और कुछ ही सालोँ में वॉयजर 2 भी वहां पहुंच जाएगा। ये दूरी इतनी है कि इस समय वॉयजर 1 से आने वाले रेडियो सिग्नल 19 घंटे में पृथ्वी तक पहुंचते हैं। वो भी तब जब ये रेडियो सिग्नल प्रकाश की चाल से चलते हैं।....... यानि 1सेकेंड में 3 लाख किलोमीटर। संलग्न चित्र में वॉयजर 1 और वॉयजर 2 की स्थिति देखी जा सकती है। नीला भाग (Heliosphere) हमारे सौर मंडल का क्षेत्र है। उसके अंदर एक छोटी सी डिस्क जैसी संरचना में हमारे सभी ग्रह हैं। और वॉयजर 1 इस नीले क्षेत्र (Heliosphere) के बाहर जा चुका है। (चित्र साभार : NASA)

इन यानों से रेडियो सिग्नल अभी भी मिल रहे हैं और संभवतः 2020 तक मिलते रहेंगे। इनकी ऊर्जा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसलिए ऊर्जा बचाने के लिए इनके कई उपकरण बंद कर दिए गए हैं। इसके कैमरे भी बंद कर दिए गए हैं। क्योंकि जहां यह यान पहुंच चुका है वहां सिवाय घुप अंधेरे के कुछ नहीं है।...... हालाँकि जब इनकी ऊर्जा पूरी तरह खत्म हो जाएगी तब भी ये अंतरिक्ष में आगे बढ़ते रहेंगे। क्योंकि अंतरिक्ष में इन्हें रोकने के लिए गुरुत्वाकर्षण जैसा कोई अवरोध नहीं हैं बस इससे सिग्नल आने बंद हो जाएंगे।...... और तब ये यान हमेशा-हमेशा के लिए पूरी तरह इंसानों से अलग हो जाएंगे। 

वॉयजर 1 सौरमंडल के बाहर जा चुका है लेकिन अभी भी वो इंसानों से जुड़ा हुआ है। लेकिन जब इसके सिग्नल आने बंद हो जाएंगे तब इसे हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कहना पड़ेगा।...... और वो समय खगोलीय घटनाओं में रुचि रखने वालों के लिए भावुक पल होगा।..... वॉयजर भले ही ब्रह्मांड में किसी दूसरी सभ्यता को न मिले तब भी इन यानों का महत्व कम नहीं होगा।...... वॉयजर इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि ये इंसान की बनाई हुई पहली ऐसी चीज है जिसे इंसान ने सूर्य के प्रभाव क्षेत्र से भी बाहर भेज दिया है। वॉयजर सिर्फ अंतरिक्षयान नहीं है..... ये इंसानी कल्पनाओं और क्षमताओं की उड़ान के प्रतीक भी हैं।

रविवार, 22 अप्रैल 2018

क्या भारत को राष्ट्रमंडल समूह से खुद को अलग नहीं कर लेना चाहिए ?

कॉमनवेल्थ या राष्ट्रमंडल खेलों में हमारे खिलाड़ियों के पदक जीतने की खबरें आयी। अच्छी बात है। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि आखिर भारत राष्ट्रमंडल देशों के समूह में जुड़ा ही क्यों है ? राष्ट्रमंडल समूह में मुख्य रूप से वो देश हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम थे, हालांकि अभी इसमें एक-दो देश ऐसे भी जुड़ गए हैं जो कभी ब्रिटेन के गुलाम नहीं रहे। मगर मूल रूप से ये ब्रिटेन के गुलाम देशों का समूह है। और इस समूह देशों का प्रमुख ब्रिटिश ताज होता है। यानी ब्रिटेन की महारानी या महाराज।.......

अब सवाल उठता है कि हम क्यों ब्रिटेन की गुलामी की निशानी को ढोते फिरें। हमें जरूरत क्या है राष्ट्रमंडल देशों के समूह में रहने की ? क्या इससे हमको कोई पैसा मिलता है ? या इसके समूह में हमको व्यापार में किसी भी प्रकार की कोई सुविधा मिलती है ? कुछ नहीं, ये सिर्फ और सिर्फ ब्रिटेन के कलंक को सिर में चिपका के रखने वाली बात है।...... भारत ब्रिक्स, शार्क जैसे दुनिया भर के व्यापारिक समूह बनाकर अलग-अलग देशों से व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त करता है मगर राष्ट्रमंडल समूह से हमें कुछ नहीं मिलता।...... होता बस ये है कि हर दो साल में इसके सदस्य देशों के मुखिया बैठक करते हैं और हर चार साल में इसके खिलाड़ी खेलते हैं। और खेलते भी कैसे हैं..... जैसे ओलंपिक खेलों से पहले दुनिया भर के देशों में ओलंपिक मशाल लेकर दौड़ा जाता है वैसे ही राष्ट्रमंडल खेलों से पहले सभी राष्ट्रमंडल देशों में ब्रिटेन की महारानी के प्रतीक 'क्वीन्स बैटन' नाम के दंड को लेकर दौड़ लगाई जाती है। मतलब राष्ट्रमंडल खेलों को ओलंपिक की तरह महान खेल आयोजन बनाया जाता है।...... वाह वाही किसकी हो रही है ? ब्रिटेन की महारानी की..... हमको क्या मिल रहा है ? कुछ नहीं। तो हम क्या पागल हैं जो गुलामी के इस कलंक को लेकर ढोते फिर रहे हैं।

जब ब्रिटेन भारत से जा रहा था तभी उसने भारत सरकार से कहा था कि वो चाहें तो कॉमनवेल्थ देशों के समूह में रह सकता है और चाहे तो नहीं। मगर भारत सरकार में उस समय कांग्रेस की पिलपिली सरकार थी जो अंग्रेजों को पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहती थी इसलिए वो कॉमनवेल्थ समूह में जुड़ गई, लेकिन अभी तो खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली भाजपा की सरकार है, शर्म की बात है कि ये सरकार अभी तक कांग्रेस की तरह ब्रिटेन का कलंक माथे में लगा कर घूम रही है।....... सरकार को कांग्रेस की तरह पिलपिला नहीं बनना चाहिए और जल्द से जल्द इस राष्ट्रमंडल के ड्रामे से भारत को बाहर निकाल देना चाहिए।

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बॉलीवुड में ऐसे फिल्मकारों का बर्चस्व तोड़ना ही होगा.....

अभी बॉलीवुड में ऐसे फ़िल्म निर्माताओं का बर्चस्व है जो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' और 'रचनात्मक आजादी' के नाम पर हिन्दू मान-मर्यादाओं का अपमान करते रहे हैं, देश पर हमले करने वाले जेहादियों का महिमामंडन करते रहे हैं। ये ऐसा करते रहे हैं और ये आगे भी ऐसे ही करते रहेंगे।...... ऐसे फिल्मकारों की हरकतों से स्वाभिमानी हिन्दू भड़कते रहे हैं और सड़कों में उतर कर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते रहे हैं........ लेकिन इन छिछोरे फिल्मकारों को उससे फर्क नहीं पड़ता, बल्कि इनकी फ़िल्में तो ऐसे विरोध प्रदर्शनों के बाद करोड़ों रुपए का व्यवसाय और कर लेती हैं।..... तो हमारे पास विकल्प क्या है ? क्या हम बस ऐसे ही बकवास करते रहेंगे या इन छिछोरे फिल्मकारों को कुछ सबक भी सिखाएंगे ?

वैसे हिंसक कार्यवाई से इनके मन में खौफ तो पैदा किया जा सकता है लेकिन इनकी गिरी हुई सोच का क्या करेंगे ?....... जरूरत है इनकी सोच पर हमला करने की..... जरूरत है बॉलीवुड में इन जैसे फिल्मकारों का बर्चस्व तोड़ने की।....
आज जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रवादी लोग बॉलीवुड में खुद को मजबूती से स्थापित करें और समाज और राजनीति के राष्ट्रवादी प्रभावशाली लोग अपनी विचारधारा के ऐसे लोगों को बॉलीवुड में स्थापित करने में अपने-अपने स्तर पर मदद करें। सड़क में खड़े होकर या सोशल मीडिया में बकवास करने से कुछ ख़ास नहीं होने वाला।....... हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग फ़िल्म बनाने लगेंगे तो इन छिछोरे फिल्मकारों को इनकी मांद में घुस कर इनकी औकात बताई जा सकती है।...... ऐसा पहले ही हो गया होता तो जैसे ही खबर पता चली कि 'जोधा-अकबर' नाम की फ़िल्म बनायी जा रही है वैसे ही कोई राष्ट्रवादी फिल्मकार महाराणाप्रताप पर फ़िल्म बनाता।..... और ठीक उसी दिन फ़िल्म रिलीज़ करता जिस दिन जोधा-अकबर रिलीज़ होती।...... एक युद्ध हल्दीघाटी पर लड़ा गया था....एक युद्ध बॉक्सऑफिस पर भी हो जाता।.....जोधा-अकबर में अकबर को हीरो बनाकर पेश किया गया, हम महाराणाप्रताप की फ़िल्म में अकबर को विलेन बताते। हम देश को बताते कि हमारे हीरो महाराणाप्रताप हैं, अकबर नहीं।

और ऐसा नहीं है कि हम ऐसा नहीं कर सकते थे, या अभी ऐसा नहीं कर सकते हैं। हमने ऐसा करके दिखाया है। सोशल मीडिया के साथ राष्ट्रवादी लोग इस प्रयोग को सफलतापूर्वक कर चुके हैं।

आप सभी जानते हैं, एक समय था जब देश में अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का एकमात्र माध्यम सिर्फ अखबार और न्यूज़ चैनल थे। तब ज्यादातर पत्रकार कांग्रेसी और वामपंथी पृष्ठभूमि के थे जो हिंदुत्ववादी विचारधारा और उनके नेताओं के खिलाफ खुल कर देश में माहौल बनाने की कोशिश करते थे।....... लेकिन फिर समय बदला और सोशल मीडिया के रूप में लोगों को भी अपनी बात फैलाने का माध्यम मिल गया। फिर क्या हुआ ? फिर देश के आम राष्ट्रवादी नागरिकों ने सोशल मीडिया में इन अखबारों और न्यूज़ चैनलों के कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकारों और इनकी पत्रकारिता की बत्ती बनानी शुरू कर दी। अब जरा ये भाजपा या आरएसएस के लिए जुबान खोल कर देखें...... सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रवादी लोग इनका ऐसा बैंड बजाते हैं कि लगभग हर छिछोरा पत्रकार खुद के ट्रोल होने को लेकर छाती पीटता रहता है।

कल तक इन फर्जी पत्रकारों के पास मीडिया का हथियार था, आज लोगों के पास सोशल मीडिया का हथियार आ गया है। इनको अब इनके ही हथियार से जवाब मिलने लगा है तो आधे से ज्यादा कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकार एकदम सीधे हो गये हैं।..... याद कीजिये पहले के गुजरात चुनाव में यही सेक्युलर पत्रकार मोदी के लिए क्या कुछ नहीं कहते थे ! आज बोल रहा है कोई ? अब ये राहुल गांधी की प्रशंसा तो कर रहे हैं लेकिन मोदी और भाजपा की आलोचना कोई नहीं कर रहा है।......

तो जो सबक ऐसे फर्जी पत्रकारों को राष्ट्रवादी लोग सिखाते हैं ऐसे ही सबक इन फर्जी फिल्मकारों को सिखाना भी जरूरी है। तभी कुछ सार्थक कार्य सिद्ध होंगे......... नहीं तो बस हम ऐसे ही जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते हुए सिर पीटते रहेंगे और ये ऐसे ही गंद फैलाते रहेंगे।