अभी कुछ समय पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा था कि "2019 का चुनाव पानीपत के युद्ध जैसा होगा।..... पानीपत का युद्ध हारने से 200 साल की गुलामी आ गई थी, वैसे ही अगर हम 2019 की लड़ाई हार गए तो हमारी विचारधारा की लड़ाई 25 साल पीछे चली जाएगी."..... अमित शाह संबोधित भले ही पार्टी कार्यकर्ताओं को कर रहे थे, मगर उनका संदेश सभी समर्थकों के लिए भी था।..... अमित शाह जहां 2019 के चुनाव को पानीपत के युद्ध की तरह चुनौतीपूर्ण और निर्णायक मान रहे हों वहीं ये भी एक संयोग है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई में जैसी स्थिति मराठों की थी, काफी कुछ वैसी स्थिति आज भाजपा ने अपने लिए बना ली है।
पानीपत में वैसे तो तीन युद्ध हुए हैं और तीनों ही युद्ध राजनीतिक दृष्टि से निर्णायक मोड़ वाले रहे हैं। लेकिन पानीपत का तीसरा युद्ध ऐसा युद्ध था जिसके बारे में हर हिंदुत्व समर्थक को जरूर जानना चाहिए।
पानीपत का तीसरा युद्ध कहने को तो मराठों और अफगानों के बीच हुआ था। लेकिन वास्तव में ये युद्ध ऐसा था जिसमें एक ओर अफगानिस्तान के मुस्लिम हमलावर, दिल्ली पर कब्जा किये हुए मुग़ल और भारत के कुछ मुस्लिम शासकों का 'महागठबंधन' था वहीं दूसरी ओर अकेले मराठा सेना थी।
हरियाणा के पानीपत में हुए इस तीसरे युद्ध की पृष्ठभूमि ऐसी थी कि सन 1760 - 61 के समय मराठा साम्राज्य पूरे भारत में सबसे शक्तिशाली और सबसे व्यापक था। जैसे 2014 के बाद से भाजपा सबसे शक्तिशाली और व्यापक थी।...... भौगोलिक दृष्टि से समझा जाए तो मराठा साम्राज्य अपने उत्कर्ष काल में महाराष्ट्र से लेकर पंजाब और उड़ीसा तक फैल चुका था।..... जिसमें आज के राजस्थान, दिल्ली और उत्तरप्रदेश के कुछ इलाके नहीं आते थे। इन इलाकों में राजपूतों, जाटों और मुसलमानों के अलग-अलग गुटों का राज था।..... आज के राजस्थान के अधिकांश भाग में राजपूतों का राज था...... मुग़ल साम्राज्य दिल्ली तक ही सिमटा हुआ था........ दिल्ली के आसपास भरतपुर, आगरा, मेरठ, रोहतक और गुड़गांव तक के इलाकों में जाटों का राज था। और यहां के जाट शासक थे सूरजमल।...... पश्चिमी उत्तरप्रदेश के रुहेलखंड (बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली का इलाका) में 'नजीब-उद-दौला' नाम के अफगान शासक का राज था।...... और लखनऊ के इलाके में नवाब 'सुजा-उद-दौला' का राज था।
अब हुआ ये कि जो मुग़ल साम्राज्य सन 1760 - 61 के समय में सिर्फ दिल्ली तक सिमट चुका था, वो मराठों की दया पर था।...... मराठे जब चाहते तभी मुग़लों के अंतिम वंशजों को मार या बंदी बनाकर मुग़ल शासन का अंत करके दिल्ली में फिर से हिन्दू राज स्थापित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।...... मराठों ने मुग़लों से संधि कर ली। इस संधि के अनुसार मुग़लों ने भारत के कई इलाकों से मराठों को टैक्स वसूलने के अधिकार दे दिया, बदले में मराठों ने मुग़लों को अभयदान दे दिया।...... हालांकि ये समझ के परे है कि अगर मराठे मुग़लों को खत्म करके दिल्ली पर अधिकार कर लेते तो क्या तब वो टैक्स नहीं वसूल सकते थे ? उन्हें मुग़लों की अनुमति की आवश्यकता ही क्या थी ?...... मगर मराठे मार खा गए कूटनीति में। उन्हें लगा समय आने पर मुग़लों की सेना और घुड़सवार दल उनके काम आएंगे।
मराठे अपना लक्ष्य भूल कर कूटनीति-कूटनीति खेलने लगे।..... जैसे इन साढ़े चार सालों में भाजपा खेलने लगी न कूटनीति-कूटनीति ; ऐसे ही।....... हमारे ये हिदुत्ववादी नेता कभी म्यांमार में मुग़ल बादशाह की मजार पर मत्था टेकते हैं तो कभी किसी विदेशी मेहमान को ताजमहल घुमाते हैं।..... लेकिन राम मंदिर पर इनको कुछ पूछो तो कानून और संविधान की दुहाई देने लगते हैं,...... बातचीत से मामले सुलझाने की बात करते हैं।...... गौरक्षकों को तो गरियाते हैं लेकिन गौहत्यारों और गौ तस्करों को कुछ नहीं बोलते।
ऐसे ही मराठे मुग़लों के साथ कूटनीति खेलने लगे।..... उधर सैकड़ों सालों से राजपूत और अन्य हिन्दू शासक इन मुस्लिम जेहादियों से लड़ कर, अपमान सह कर जैसे-तैसे इनसे मोर्चा ले रहे थे।...... और जब मराठों के रूप में हिंदुओं की शक्ति बढ़ी तो राजपूतों को मराठों से उम्मीद जागी कि अब इन मुस्लिम जेहादियों से सैकड़ों साल का हिसाब-किताब बराबर किया जा सकता है।..... जाटों ने भी मराठों को कहा था कि इन मुग़लों को खत्म कर दो।..... जैसे आज हिंदुत्ववादियों को उम्मीद थी न कि अब मोदी सरकार आ गयी है तो अयोध्या में भव्य राम मंदिर बन जाएगा, ऐसे ही उम्मीद राजपूतों और जाटों को भी मराठों से जागी।....... लेकिन मराठों ने राजपूतों और जाटों को निराश कर दिया।....... शिवाजी महाराज के समय से ही मराठों का लक्ष्य था पूरे भारत में हिन्दू साम्राज्य स्थापित करना, लेकिन शिवाजी के वंशज जब अपने लक्ष्य के बिल्कुल करीब थे, वो तभी चूक गए।
मराठे भले ही अपना लक्ष्य भूल गए थे लेकिन मुग़ल नहीं भूले थे।...... मुग़ल भले ही मराठों के संरक्षण में रह रहे थे लेकिन वो मराठों या किसी अन्य धर्म की छत्रछाया में इस्लामिक राज कैसे बर्दाश्त कर सकते थे ! उन्हें फिर से एक मुक्कमल इस्लामिक राज स्थापित करना था।...... और यही इस्लामिक राज रुहेलखंड का नजीबुद्दौला भी चाहता था।...... इसलिए मराठों को उत्तर भारत से खदेड़ने के लिए मुग़ल और रुहेलखंड के नजीबुद्दौला ने एक गठबंधन बना लिया और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली को आक्रमण के लिए आमंत्रित किया, जो पहले भी भारत पर आक्रमण कर चुका था। इसके साथ ही इन्होंने अवध के नवाब सुजाउद्दौला को भी अपने साथ मिला लिया।...... हालांकि पूर्व में मराठों ने इसी नजीबुद्दौला से अवध के राजा की रक्षा की थी।...... लेकिन 'एक इस्लामिक राज' के नाम पर अवध के नवाब मराठों के खिलाफ और गठबंधन के साथ हो गए।
इससे पहले भारत के कुछ हिस्सों में कब्जा किये हुए अब्दाली की सेना को मराठों ने पंजाब के आगे तक खदेड़ दिया था, जिससे अब्दाली मराठों से फिर से जंग लड़ने की योजना बना रहा था मगर मराठों की शक्ति के सामने खड़ा होने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।...... इधर मुग़ल और अन्य मुस्लिम शासक भी मराठों को खदेड़ना चाहते थे लेकिन वो भी साहस नहीं जुटा पा रहे थे।...... लेकिन जब अब्दाली, मुग़ल, नजीबुद्दौला और अवध के नवाब एक साथ हो गए तो तब शुरू हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई। जिसने इतिहास को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।
पानीपत के मैदान में एक ओर गठबंधन सेना थी वहीं दूसरी ओर मराठे अकेले।...... ऐसा भी नहीं है कि सारे मुसलमान मुग़लों के साथ थे। हमेशा की तरह मराठों की सेना में कई मुसलमान सैनिक भी थे।..... मराठों के तोपखाने के प्रमुख इब्राहिम गर्दी भी एक मुसलमान ही थे।...... वो भले ही मुस्लिम थे लेकिन खुद को आक्रमणकारी मुग़लों से अलग मानते थे, वो किसी इस्लामिक राज के लिए नहीं लड़ रहे थे।
पानीपत की लड़ाई में एक ओर अफगानों और मुग़लों की गठबंधन सेना थी वहीं दूसरी ओर राजपूतों और जाटों ने मराठों का साथ न देने का फैसला किया। क्योंकि जब मराठों ने समय रहते उनकी बात मान कर मुग़लों को खत्म नहीं किया तो अब उनसे सहायता की कैसी अपेक्षा !! राजपूतों और जाटों ने युद्ध से दूर रहने का फैसला कर लिया।...... एक प्रकार से उन्होंने NOTA दबा दिया।
पानीपत की भीषण लड़ाई में मराठों की हार हुई और उसके बाद मराठों का कत्लेआम शुरू हुआ।...... मराठों के साथ एक समस्या ये भी थी कि ये अपने साथ अपने परिवार लेकर भी चलते थे।..... जब मराठे हार गए तो आदमियों को तो काट दिया गया और उनकी औरतों और बच्चों को उठा लिया गया।..... मराठे हिन्दू स्वराज का अपना लक्ष्य भूल गए थे मगर मुस्लिम शासक अपने इस्लामिक राज का लक्ष्य नहीं भूले थे।...... ये युद्ध दोपहर में ही खत्म हो गया था लेकिन मराठों का कत्लेआम आधी रात तक चलता रहा।...... हिन्दू स्वराज का सपना टूट चुका था।..... तब अपनी जान बचाकर भागते मराठा परिवारों को जाट राजा सूरजमल ने संरक्षण दिया।...... इसके बाद हालांकि मराठों ने फिर से अपनी शक्ति बढ़ाई लेकिन वो हिन्दू स्वराज स्थापित नहीं कर पाए। क्योंकि अब हालात बहुत बदल चुके थे, अब भारत में अंग्रेजों का भी वर्चस्व बढ़ता जा रहा था।
तो आज जब अमित शाह कार्यकर्ताओं को पानीपत की याद दिला रहे हैं तो अच्छा होता वो इन साढ़े चार सालों में अपने नेताओं को भी उसकी याद दिलाते रहते।...... वो नेता जो अयोध्या मसले पर मुग़लों का नाम लेने वाले मुसलमानों के साथ कूटनीति-कूटनीति खेल रहे हैं।..... इन नेताओं को इतना भी नहीं समझ में आ रहा है कि भारत में रहने वाले वो मुसलमान जो मुग़लों की तारीफ करते हैं, बाबर की मस्जिद को लेकर छाती पीटते हैं वो सब छुपे हुए जेहादी हैं।..... आज नहीं तो कल वो पलट कर हमला जरूर करेंगे, जैसे मराठों पर किया था। इन जहरीले सांपों का सिर आज ही नहीं कुचला गया तो यही सांप कल हमें डसेंगे।...... ये बात हिंदुत्ववादी लोग भाजपा को पिछले साढ़े चार सालों से समझा रहे हैं, मगर भाजपा को समझ नहीं आयी।..... मराठों को जब बोला गया था कि मुग़लों को खत्म कर दो तब मराठों को भी समझ नहीं आयी थी।...... 1761 के पानीपत में राजपूतों और जाटों ने तो मराठों का साथ नहीं दिया था, लेकिन 2019 के पानीपत में भाजपा के हिंदुत्ववादी समर्थक भाजपा का साथ कितना देते हैं और कितना नहीं ये समय के गर्भ में है।
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