शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बॉलीवुड में ऐसे फिल्मकारों का बर्चस्व तोड़ना ही होगा.....

अभी बॉलीवुड में ऐसे फ़िल्म निर्माताओं का बर्चस्व है जो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' और 'रचनात्मक आजादी' के नाम पर हिन्दू मान-मर्यादाओं का अपमान करते रहे हैं, देश पर हमले करने वाले जेहादियों का महिमामंडन करते रहे हैं। ये ऐसा करते रहे हैं और ये आगे भी ऐसे ही करते रहेंगे।...... ऐसे फिल्मकारों की हरकतों से स्वाभिमानी हिन्दू भड़कते रहे हैं और सड़कों में उतर कर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते रहे हैं........ लेकिन इन छिछोरे फिल्मकारों को उससे फर्क नहीं पड़ता, बल्कि इनकी फ़िल्में तो ऐसे विरोध प्रदर्शनों के बाद करोड़ों रुपए का व्यवसाय और कर लेती हैं।..... तो हमारे पास विकल्प क्या है ? क्या हम बस ऐसे ही बकवास करते रहेंगे या इन छिछोरे फिल्मकारों को कुछ सबक भी सिखाएंगे ?

वैसे हिंसक कार्यवाई से इनके मन में खौफ तो पैदा किया जा सकता है लेकिन इनकी गिरी हुई सोच का क्या करेंगे ?....... जरूरत है इनकी सोच पर हमला करने की..... जरूरत है बॉलीवुड में इन जैसे फिल्मकारों का बर्चस्व तोड़ने की।....
आज जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रवादी लोग बॉलीवुड में खुद को मजबूती से स्थापित करें और समाज और राजनीति के राष्ट्रवादी प्रभावशाली लोग अपनी विचारधारा के ऐसे लोगों को बॉलीवुड में स्थापित करने में अपने-अपने स्तर पर मदद करें। सड़क में खड़े होकर या सोशल मीडिया में बकवास करने से कुछ ख़ास नहीं होने वाला।....... हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग फ़िल्म बनाने लगेंगे तो इन छिछोरे फिल्मकारों को इनकी मांद में घुस कर इनकी औकात बताई जा सकती है।...... ऐसा पहले ही हो गया होता तो जैसे ही खबर पता चली कि 'जोधा-अकबर' नाम की फ़िल्म बनायी जा रही है वैसे ही कोई राष्ट्रवादी फिल्मकार महाराणाप्रताप पर फ़िल्म बनाता।..... और ठीक उसी दिन फ़िल्म रिलीज़ करता जिस दिन जोधा-अकबर रिलीज़ होती।...... एक युद्ध हल्दीघाटी पर लड़ा गया था....एक युद्ध बॉक्सऑफिस पर भी हो जाता।.....जोधा-अकबर में अकबर को हीरो बनाकर पेश किया गया, हम महाराणाप्रताप की फ़िल्म में अकबर को विलेन बताते। हम देश को बताते कि हमारे हीरो महाराणाप्रताप हैं, अकबर नहीं।

और ऐसा नहीं है कि हम ऐसा नहीं कर सकते थे, या अभी ऐसा नहीं कर सकते हैं। हमने ऐसा करके दिखाया है। सोशल मीडिया के साथ राष्ट्रवादी लोग इस प्रयोग को सफलतापूर्वक कर चुके हैं।

आप सभी जानते हैं, एक समय था जब देश में अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का एकमात्र माध्यम सिर्फ अखबार और न्यूज़ चैनल थे। तब ज्यादातर पत्रकार कांग्रेसी और वामपंथी पृष्ठभूमि के थे जो हिंदुत्ववादी विचारधारा और उनके नेताओं के खिलाफ खुल कर देश में माहौल बनाने की कोशिश करते थे।....... लेकिन फिर समय बदला और सोशल मीडिया के रूप में लोगों को भी अपनी बात फैलाने का माध्यम मिल गया। फिर क्या हुआ ? फिर देश के आम राष्ट्रवादी नागरिकों ने सोशल मीडिया में इन अखबारों और न्यूज़ चैनलों के कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकारों और इनकी पत्रकारिता की बत्ती बनानी शुरू कर दी। अब जरा ये भाजपा या आरएसएस के लिए जुबान खोल कर देखें...... सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रवादी लोग इनका ऐसा बैंड बजाते हैं कि लगभग हर छिछोरा पत्रकार खुद के ट्रोल होने को लेकर छाती पीटता रहता है।

कल तक इन फर्जी पत्रकारों के पास मीडिया का हथियार था, आज लोगों के पास सोशल मीडिया का हथियार आ गया है। इनको अब इनके ही हथियार से जवाब मिलने लगा है तो आधे से ज्यादा कांग्रेसी और वामपंथी पत्रकार एकदम सीधे हो गये हैं।..... याद कीजिये पहले के गुजरात चुनाव में यही सेक्युलर पत्रकार मोदी के लिए क्या कुछ नहीं कहते थे ! आज बोल रहा है कोई ? अब ये राहुल गांधी की प्रशंसा तो कर रहे हैं लेकिन मोदी और भाजपा की आलोचना कोई नहीं कर रहा है।......

तो जो सबक ऐसे फर्जी पत्रकारों को राष्ट्रवादी लोग सिखाते हैं ऐसे ही सबक इन फर्जी फिल्मकारों को सिखाना भी जरूरी है। तभी कुछ सार्थक कार्य सिद्ध होंगे......... नहीं तो बस हम ऐसे ही जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते हुए सिर पीटते रहेंगे और ये ऐसे ही गंद फैलाते रहेंगे।

सोमवार, 13 नवंबर 2017

सतरंगी दुनिया....


कल रविवार को दिल्ली का बारहखंभा रोड़ 'विशिष्ट लैंगिक लक्षणों' वाले लोगों की सतरंगी परेड का गवाह बना। जिसमें हर साल की तरह समलैंगिकों और किन्नरों ने नाच-गा कर खुद पर गर्व प्रकट किया और धरना देकर अपने लिए समाज में समान अवसरों की मांग की।.... देखा जाए तो ये बड़े दुःख की बात है कि हमारे समाज में एक तबका ऐसा भी है जिसे इतने बड़े और परिपक्व लोकतंत्र में अपने लिए समान अवसर मांगने पड़ रहे हैं।.... यकीनन हमारे संविधान और समाज में लोगों को समान अवसर मिलते रहे हैं लेकिन समलैंगिकों और किन्नरों को एक नागरिक होने के नाते समाज में जो सम्मान और स्थान मिलना चाहिए वो सम्मान देने में हम कहीं न कहीं चूक जाते हैं।..... हमारे समाज में इनकी स्वीकार्यता अभी तक नहीं बन पायी है।...... खास तौर से पुरुषों के बीच में। महिलाऐं चूँकि थोड़ी उदार होती हैं इसलिए ऐसे 'विशिष्ट लैंगिक लक्षणों' वाले लोगों को उनके साथ रहने में उतनी असहजता नहीं होती जितनी पुरुषों के साथ होती है।....... जो कि बहुत गलत बात है। पुरुषों में ऐसे समुदाय के लोगों की स्वीकार्यता तो छोड़िये कई लोग तो इनके खिलाफ उग्र विरोध की मानसिकता रखते हैं। मानो कोई समलैंगिक है या किन्नर है तो उसने पता नहीं कौन सी गलती कर दी !

समलैंगिक या किन्नर होना कोई ऐसी बात नहीं है कि उन्हें घृणा या उपहास की नजर से देखा जाए। वो केवल एक लक्षण है जो हार्मोन्स के कारण प्रभावित होता है। और हार्मोन्स पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। हार्मोन्स की सक्रियता के कारण ही एक उम्र आने के बाद लड़के और लड़कियां एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। लेकिन जब किसी के हार्मोन्स गड़बड़ हो जाते हैं तो उसके लैंगिक लक्षण बदलने लगते हैं, फिर वो किन्नर भी बन सकता/सकती है और समलैंगिक भी। अब कोई समलैंगिक अपनी तरह के लोगों की ओर आकर्षित हो रहा है या हो रही है तो इसमें बुरी बात क्या है ? वो दूसरों को मजबूर तो नहीं कर रहे हैं कि तुम भी मुझे पसंद करो।...... अगर हम कुछ करना ही चाहते हैं तो हमें उन हार्मोन्स और उन कारणों का पता लगाना चाहिए जो किसी व्यक्ति के समलैंगिक होने के लिए उत्तरदायी हैं और उन हार्मोन्स के सही व्यवहार के लिए चिकित्सीय उपाय खोजने चाहिए। मगर जब तक हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तब तक कम से कम समलैंगिकों के प्रति भेदभाव तो न करें। हम कुछ अच्छा नहीं कर सकते हैं तो कुछ बुरा तो न करें।

और ऐसे ही किन्नरों की बात की जाए तो किन्नर भी हमारे समाज का हिस्सा हैं, जो उपेक्षा का शिकार है। अब अगर कोई बच्चा किन्नर निकला तो उसमें उसकी क्या गलती है ? क्या हम अपने समाज में किन्नरों को अपने साथ उठने-बैठने, पढाई करने, नौकरी करने के अधिकार नहीं दे सकते ?

हालाँकि किन्नरों के मामले में कुछ सकारात्मक होता हुआ भी दिख रहा है। अभी कुछ साल पहले भारत के चुनाव आयोग ने किन्नरों को वोट डालने का अधिकार दिया था। और अब कई जगह फॉर्म भरते हुए 'महिला' और 'पुरुष' से अलग एक 'ट्रांसजेंडर' का कॉलम भी रखा जाता है। पहले लिंग के कॉलम में सिर्फ पुरुष और महिला का ही विकल्प होता था। ये बातें समाज में किन्नरों की बढ़ती स्वीकार्यता की ओर इशारा करता है। और सिर्फ यही नहीं, हमारे संत समाज की ओर से भी किन्नरों को सम्मान देने के मामले में कुछ अच्छी पहल होती हुई भी दिख रही है। ऐसी ही एक पहल है 'किन्नर अखाड़ा'। हिन्दू सन्यासियों के 13 अखाड़ो में किन्नर सन्यासियों के लिए भी एक किन्नर अखाड़ा बनाया गया है।

किन्नरों के मामले में जहाँ हमारा नजरिया थोड़ा सकारात्मक हो रहा है वहीँ समलैंगिकों के मामले में ऐसे सकारात्मक नजरिया बनने की रफ़्तार थोड़ी धीमी है। हमारे समाज में समलैंगिकों को सामान्य लोगों की तुलना में गन्दा और अक्षम माना जाता है। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। समलैंगिक भी उतने ही सामर्थ्यवान और बुद्धिमान होे सकते हैं जैसे एक सामान्य मनुष्य होता है। यूरोप के एक देश 'आयरलैंड' में तो जो भारतीय मूल के प्रधानमंत्री हैं वो एक समलैंगिक हैं। और सिर्फ आयरलैंड ही नहीं बेल्जियम, आइसलैंड, सर्बिया और लक्सेम्बर्ग जैसे देशों में समलैंगिक सत्ता संभाल चुके हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि ये उन देशों में हैं जिनका मानव विकास सूचकांक दुनिया में सबसे ज्यादा है। अर्थात् दुनिया भर में सबसे अच्छा जीवन स्तर इन देशों के लोगों का होता है। अच्छे जीवनस्तर का मतलब है कि वहां अस्पताल में जगह न मिलने के कारण किसी गर्भवती महिला को अपने बच्चे को बीच सड़क में जन्म नहीं देना पड़ता, वहां किसी अस्पताल में मरीज को रेहड़ी में नहीं लाया जाता, वहां कोई अनपढ़ नहीं होता, वहां कोई भूख से नहीं मरता, वहां किसी को अपने मृत परिजन को अस्पताल से घर अपने कंधे में उठाकर नहीं जाना पड़ता। इन देशों का जीवनस्तर बहुत अच्छा है क्योंकि उन्हें पता है उन्हें किस चीज के लिए लड़ना है। उन्हें पता है उन्हें समलैंगिकता से नहीं गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा से लड़ना है।

मगर हमारे देश में हम अपनी दकियानूसी सोच के कारण न केवल समलैंगिकों और किन्नरों का जीवन  बर्बाद करते हैं बल्कि देश और समाज के काम आने वाली उनकी संभावित योग्यताओं और क्षमताओं का भी लाभ नहीं उठा पाते।



सोमवार, 6 नवंबर 2017

हैलो ओरायन.....

हैलो ओरायन.....

सर्दियाँ शुरू होते ही रात को आसमान में सबसे अलग संरचना वाला ओरायन (Orion) तारामंडल दिखाई देने लगा है (चित्र 1). 
ओरायन (Orion) तारामंडल  (चित्र 1)
आपने अक्सर 'मृगशीर्ष नक्षत्र' का नाम सुना होगा, वो यही है। ये तारामंडल सिर्फ सर्दियों में दिखाई देता है क्योंकि गर्मियों में पृथ्वी इस तारामंडल की बिपरीत दिशा में सूर्य के पीछे रहती है। लेकिन सूर्य के चक्कर काटते हुए जैसे ही पृथ्वी अपनी कक्षा के दूसरे हिस्से में पहुँचती है वैसे ही ये तारामंडल दिखाई देने लगता है। क्योंकि तब पृथ्वी और इस तारामंडल के बीच में सूर्य नहीं होता है। (चित्र 2)

(चित्र 2)
दिल्ली में प्रदूषण के कारण ये दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में तो दिखना मुश्किल है। लेकिन गाँव-देहात या छोटे शहरों में, जहाँ आसमान साफ़ है वहां इसे आसानी से देखा जा सकता है। पूरब दिशा की ओर मुँह करने पर हमारी दायीं ओर यानि दक्षिण दिशा में आसमान में इसे देखा जा सकता है। मुख्य रूप से सात तारोँ के समूह वाले इस तारा मंडल की संरचना इतनी अलग और स्पष्ट है कि इसे देखने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती। इस तारामंडल में दो तारे ऊपर, दो तारे नीचे और बीच में तीन तारों का समूह है।

ओरायन तारामंडल सिर्फ अलग संरचना के लिए ही रोमांचित नहीं करता, ये अपनी प्रकृति में भी बहुत रोमांचक है।.........ओरायन में आप तारों को बनते और नष्ट होते हुए देख सकते हो।

ओरायन तारामंडल को थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो इसके सबसे ऊपर, बायीं ओर का तारा थोड़ा लाल रंग (Red Giant Star) का दिखेगा। और सबसे नीचे, दायीं ओर का तारा थोड़ा नीला (Blue Giant Star) दिखाई देगा। ये दोनों तारे ख़त्म हो रहे हैं। (जब कोई तारा अपनी अंतिम अवस्था में पहुँच जाता है तो उसका आकार बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और वो लाल या नीले रंग का हो जाता है। तारों की इसी अवस्था को खगोलीय भाषा में लाल दानव या Red Giant और नीला दानव या Blue Giant कहते हैं।) ये दोनो तारे अपनी अंतिम अवस्था में पहुँच चुके हैं।

अगर आकार की बात करें तो ये दोनों तारे कितने बड़े हैं ?.........  यूँ समझ लो अगर हमारा सूर्य एक मटर के दाने के बराबर है तो नीला तारा (Blue Giant) मिट्टी के घड़े के बराबर है और लाल तारा (Red Giant) ट्रैक्टर के पिछले टायर जितना बड़ा है (चित्र 3 और 4). यानि हमारा सूर्य मटर के दाने के बराबर है तो लाल तारा ट्रैक्टर के पिछले टायर जितना बड़ा है।....... है न एक दम शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद.......

(चित्र 3)
एक समय ऐसा आएगा जब ये लाल तारा फैलते-फैलते एक धमाके से फट जाएगा। वैज्ञानिकों का मत है कि तब यह हमारी पृथ्वी में पूर्णिमा के चाँद से भी तेज चमकता हुआ दिखेगा। यानि उस समय रात को हमारे आसमान में दो चाँद दिखाई देंगे।
(चित्र 4)

ये तो थी नष्ट होने वाली बात अब थोड़ा निर्माण की बात भी कर लेते हैं.......... ओरायन तारामंडल में तारे सिर्फ नष्ट ही नहीं हो रहे हैं वहां पर नए तारे भी बन रहे हैं। इस तारामंडल के बीच में देखेंगे तो आपको एक सीधी पंक्ति में तीन तारों का समूह दिखाई देगा उसे 'ओरायन बेल्ट' कहते हैं। ओरायन बेल्ट के ठीक नीचे ध्यान से देखने पर आपको खड़ी रेखा (vertical line) में कुछ धुंधले से तारे दिखाई देंगे।....... यही धुंधले गैस के बादल इकठ्ठा होकर तारे बनते हैं। यानि जब आप उन धुंधले तारों को देखोगे तो इसका मतलब है आप अपनी नग्न आँखों से तारे बनते हुए देख रहे हो।

अब अगली बार आप रात को आसमान में जब इस तारामंडल को देखेंगे तो आपका तारों को देखने का अनुभव पहले से कुछ अलग होगा। और वैसे भी कहते हैं न......

"रात का आसमान बहुत ही रोमांचक होता है, यदि आपको पता चल जाए कि आप देख क्या रहे हो।"

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

तुम्हारी भक्ति मूर्खता, मेरी भक्ति समझदारी ?

कई लोग गुरमीत राम रहीम के बहाने अन्य बाबाओं को निशाने पर ले रहे हैं। और ऐसे बाबाओं के भक्तों की बुद्धि, विवेक पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं। कुल मिलाकर सभी ये साबित करना चाहते हैं मानों इन बाबाओं के भक्त मूर्ख हैं, विवेकहीन हैं और खुद वो लोग बड़े समझदार हैं।
भाई ये विवेकहीनता की समस्या अकेले उन बाबाओं के भक्तों की नहीं है बल्कि हम सभी की है। मगर हमें आदत पड़ी हुई है कि हम खुद को बहुत होशियार मानते हैं और दूसरों को बुद्धिहीन। अब देखो न, कुछ लोग कहते हैं कि इन बाबाओं के चक्कर में मत पड़ो, अपने देवी-देवताओं की पूजा करो। और यही देवी-देवताओं की बात करने वाले देवी-देवताओं को 'खुश' करने के लिए तमाम तरह के टोने-टोटके करते हैं, निरीह पशुओं की बलि देते हैं। जो बाबाओं के पीछे जा रहे हैं उनमें दिमाग नहीं है तो जो धर्म के नाम पर जानवरों की बलि देने की बात जो पण्डे-पुजारी और उनके यजमान करते हैं वो क्या बहुत दिमाग वाली बात करते हैं ?
और सिर्फ बलि देने की ही बात नहीं है, अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे हमारा आज का हिन्दू धर्म पूरी तरह खौफनाक कहानियों से भरा पड़ा है। अगर औरत ने ब्रत तोड़ा तो पति मर गया, पति ने गलत मन्त्र पढ़ा तो पत्नी मर गई, धार्मिक अनुष्ठान ठीक से नहीं किये तो बच्चा मर गया। क्या है ये ? ये हिन्दू धर्म है क्या ? भगवान् को इतना मेन्टल समझा है क्या, कि ब्रत तोड़ देने से वो पति, पत्नी या बच्चे को मार डाले। हमारे पंडित-पुजारी धर्म का ज्ञान कम देते हैं, डराते ज्यादा हैं। बाबाओं के पीछे जाने वाले लोग विवेकहीन होते हैं तो ये पण्डे-पुजारियों की बातों से डरने वाले लोग क्या बहुत विवेकशील होते हैं ?
हम लोगों ने आज अपने धर्म को वो बना दिया है जिसमें हम भगवान् को मानते नहीं हैं, उससे डरते हैं। और ये डर हिन्दू समाज में किस हद तक घुस चुका है इसका उदाहरण देखिये - कई बार बात उठती है तो मैं लोगों को कहता हूँ मैं भगवान् को नहीं मानता। हालाँकि मेरे ऐसा कहने का मतलब ये नहीं होता कि अगर वो भगवान को मानते हैं तो वो गलत हैं। मैं तो बस अपना मत रखता हूँ, वो भी कभी इस विषय पर चर्चा हो रही हो तो। तो जब मैं ऐसा कहता हूँ कि मैं भगवान् के अस्तित्व को नहीं मानता तो लोग झट से कहते हैं भाई मान जाएगा। मैं कहता हूँ कैसे मान जाऊँगा ? तो वो फिर कहते हैं भाई तू देखता रह एक दिन तू सब मानेगा। मैं फिर पूछता हूँ भाई आखिर ऐसे कैसे मान जाऊँगा ? तो कहते हैं "जिस दिन तेरे साथ कुछ बुरा होगा उस दिन तू सब मानने लगेगा।" अब बताओ ये क्या बात हुई ! तो मैं उन्हें कहता हूँ भाई तू मुझे बता रहा है या धमका रहा है ? भगवान् को लेकर उसकी क्या समझ है वो नहीं बताएगा, क्योंकि उसकी कोई समझ ही नहीं है तो बताएगा क्या ? उसने भगवान् से डरना सीखा है तो मुझे भी डरा ही रहा है। तो फिर मैं ऐसे लोगों को कहता हूँ "ठीक है भाई जिस दिन मेरे साथ कुछ बुरा होगा उस दिन मैं भगवान् को मानने लगूंगा मगर तू तो आज भगवान् को मानता है ? तेरे साथ कुछ बुरा नहीं होगा, है न ?" बुरा-भला तो सबके साथ ही होना है, उसमें भगवान को मानने न मानने का क्या मतलब ? गजब का विवेक और बुद्धिमानी है भाई लोगों की ! खुद तो डरे हुए हैं, मुझे भी डरा रहे हैं।
अब इन्हीं डरे-घबराए लोगों में से कुछ लोग जो वास्तव में ईश्वरीय ज्ञान की तलाश में रहते हैं उन्हें कौन ज्ञान देगा ? जिन पण्डे-पुजारियों और मठाधीशों पर जिम्मेदारी थी धर्म का ज्ञान देने की वो तो डरा रहे हैं। तो ऐसे में उदय होता है बाबा लोगों का। आप उन बाबाओं का मजाक उड़ा सकते हो मगर याद रखो वो लोगों को धर्म और भगवान् के नाम पर डराते नहीं हैं, वो ईश्वर के बारे में ज्ञान देते हैं। अब इन बाबाओं का ईश्वर को लेकर जो ज्ञान है वो सही है या नहीं वो अलग विषय है लेकिन कम से कम वो लोगों को कुछ बताते तो हैं, भगवान् के नाम पर डराते तो नहीं हैं। और यही बात लोगों को सही लगती है।
ये समय बाबा लोगों की आलोचना का नहीं हमारे अत्ममंथन का है। हमारे धर्म को सुधार की जरूरत है। सनातन धर्म आदि-अनादि काल से क्या है, कैसा है उसे जन-जन तक पहुँचाने की जरूरत है। हिन्दू धर्म में महंत, पुरोहित, महामंडलेश्वर, अखाड़ा परिषद्, शंकराचार्य जैसी तमाम व्यवस्थाओं में सुधार की जरूरत है।
पुनश्च :- आपको इस बात में हैरानी हो सकती है कि अगर मैं भगवान् को नहीं मानता तो मैं मंदिर क्यों जाता हूँ ? मैं हवन क्यों करता हूँ ? हिन्दू धर्म की इतनी चिंता क्यों कर रहा हूँ ? तो आपको बता दूँ हमारी सनातन परम्परा में अस्तिकवाद और नास्तिकवाद हमेशा से रहे हैं। यही तो हिन्दू धर्म की विशेषता है कि आप भगवान् को नहीं मानते तो भी हिन्दू होते हो। आप भगवान् को नहीं मानते तो इसका मतलब ये थोड़े ही है कि आपको मंदिर भी नहीं जाना चाहिए। लेकिन कई लोगों को लगता है कि भगवान् को नहीं मानते तो मंदिर क्यों जाना ? इसीलिए तो कहा मैंने, हिन्दू धर्म में सुधार की आवश्यकता है। मैं भगवान् को नहीं मानता लेकिन अपनी धार्मिक और सांकृतिक विरासत को तो मानता हूँ। हम भगवान् को माने या न माने लेकिन भगवान्, ईश्वर और देवी-देवताओं को लेकर हमारे सनातन धर्म में जो अवधारणाएं हैं उन्हें तो जानना ही चाहिए। स्वामी विवेकानंद भी एक समय तक भगवान् को नहीं मानते थे जब तक कि उन्हें गुरु रामकृष्ण परमहंस नहीं मिल गए। भगवान् को न मानना मेरे लिए भी कोई प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। भगवान् के होने का औचित्य मुझे समझ नहीं आता इसलिए भगवान् को नहीं मानता, जिस दिन समझ में आ जाएगा उस दिन शायद मानने भी लगूंगा।