भारत जैसे विशाल देश में आपदाएं समय समय पर अलग अलग रूपों में आती है. कहीं बाढ़ तो कहीं चक्रवाती तूफ़ान, कहीं बादल फटता है तो कहीं भूस्खलन होता है। प्रकृति में ये सभी घटनाएं पहले भी होती आई हैं मगर प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप जैसे - जैसे बढ़ता जा रहा है इस प्रकार की घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हमें ध्यान देना चाहिए की प्रकृति के साथ आवश्यकता से अधिक छेड़ - छाड़ न करें, साथ ही आने वाली संभावित आपदाओं का सामना करने के लिए भी हम तैयार रहें। इसलिए दुनिया भर की सरकारें और संस्थाएं आपदा प्रबंधन के कार्य में लगे हुए हैं।
अब चूंकि बात आपदा के प्रबंधन की है तो दुःख इस बात का होता है की देश के कर्णधारों द्वारा तमाम प्रबंधों की तरह आपदा के प्रबंधन को भी चौपट कर दिया है। इसका ताजा उदहारण हाल ही में जम्मू कश्मीर में आई बाढ़ है। लोगों के घर डूब गए, न खाने का पता था न पीने के पानी का और न ही सरकार का। सेना ने जैसे - तैसे करके मोर्चा संभाला और लोगों की हर सम्भव मदद की। मगर सरकार के आपदा प्रबंधन को तो मनो लकवा मार गया था। अब तक हमने कई बार देखा है की कोई सरकारी मशीनरी असफल हो गई हो। मगर यहाँ तो पूरी सरकार ही गायब थी। इस बात से लोगों में काफी गुस्सा भी था। और फिर कुछ दिनों के पश्चात लोगों के गुस्से से 'चिंतित' राज्य के मुख्यमंत्री अचानक प्रकार होते हैं और लोगों के सामने अपना दुखड़ा रोने लगते हैं। उनका कहना था की उनकी सरकार के तमाम कार्यालय भी बाढ़ में डूब गए थे, न बिजली थी, न मोबाइल काम कर रहे थे, किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा था और वे खुद गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे।
वो अपने आप को असहाय बता रहे हैं। वो मुख्यमंत्री हैं, वो कहते है की राज्य के लोगों को उन पर भरोसा करना चाहिए, वो लोगों की हर सम्भव मदद करेंगे। अब सोचने की बात है की जो मुख्यमंत्री खुद की मदद नहीं कर पा रहे हों वो दूसरों की मदद क्या करेंगे। मुख्यमंत्री जी से ये भी पूछा जा सकता है की सेना के तमाम कार्यालय, वाहन आदि भी बाढ़ की भेंट चढ़ गए थे फिर भी उन्होंने खुद को तो संभाला ही, साथ ही लोगों को भी बाढ़ के प्रकोप से भी बचाया। सच्चाई तो यह है की इस बाढ़ ने राज्य सरकार के निकम्मेपन को उजागर किया है। इस बाढ़ ने इस बात की पोल खोल दी है की आपदा प्रबंधन को लेकर हमारी तमाम सरकारें कितनी 'सक्रीय' हैं। जम्मू कश्मीर तो बस एक बानगी भर है देश के अन्य भागों की स्थिति भी कोई संतोषजनक नहीं हैं। लगभग साल भर पहले ही उत्तराखंड त्रासदी ने भी देश में आपदा प्रबंधन की स्थिति को आइना दिखाया था। पहले तो सरकार ने मौसम विभाग की ओर से जारी केदारनाथ क्षेत्र में भारी बारिश की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया फिर जब वो चेतावनी आपदा में बदल गई तो भी सरकार को हरकत में आने में दो तीन दिन लग गए वो भी तब, जब तमाम पत्र-पत्रिकाओं और खबरिया चैनलों ने वहां की बत्तर होती जा रही स्थिति को देश भर के सामने रखा। सरकार कहती रही की स्थिति काबू में है मगर इस बात पर भी संदेह है कि सरकार को मालूम भी था कि स्थिति आखिर कितनी भयावह है।
बहरहाल प्राकृतिक आपदाओं से पहले हमें चेतावनी मिलती भी रहती हैं, कभी मौसम विभाग की ओर से तो कभी प्रकृति के द्वारा खुद ही। अब ये हम पर निर्भर करता है की हम उन चेतावनियों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और आने वाली अप्रिय घटनाओं के लिए कितने तैयार रहते हैं।
अब वरुणावत पर्वत का ही उदहारण देखिये, उत्तराखंड के उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत कई सालों से धीरे धीरे दरकता जा रहा है जिस कारण पहले भी उत्तरकाशी में इस पर्वत में हुए भूस्खलन से भारी जान - माल का नुकसान हुआ था । और आगे भी इसके द्वारा किसी अनहोनी की आशंका बनी हुई है। स्थिति यह है की दूर से ही पर्वत को देखने पर उसमे भूस्खलनों के कारण बने विशालकाय निशान देखे जा सकते हैं। सरकार ने हालाँकि इस पर्वत के भूस्खलन को रोकने के कई उपाय कर लिए, कई करोड़ रुपये भी फूंक दिए मगर स्थिति अभी भी चिंताजनक है। तमाम प्रयासों के बावजूद भी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि स्थिति नियंत्रण में है।
और अंत में :- हम कई बार पढ़ते और सुनते हैं कि पृथ्वी खतरे में है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे विषयों में जागरूकता पैदा करने के लिए इस प्रकार की पंक्तियों का प्रयोग किया जाता है।
पृथ्वी के करोड़ों साल के इतिहास में अनेकों उल्काएं इससे टकरा चुकी हैं, अनेकों - अनेकों ज्वालामुखी फट चुके हैं। पृथ्वी कई बार प्रलय का सामना कर चुकी है। कई प्रलय तो ऐसी भी आई हैं जिससे कोई पूरी की पूरी प्रजाति ही नष्ट हो गई। इन सारी प्रलयों का सामना करने के बाद भी पृथ्वी बानी हुई है। इसलिए ये कहना नादानी ही होगी की पृथ्वी खतरे में है। सच्चाई तो यह है की पृथ्वी नहीं बल्कि हम खतरे में हैं।
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