खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है - स्वामी विवेकानंद !
उसके लिए कभी फ़िल्मी स्टाइल में हाथों में मोमबत्तियां जलाकर रैलियां निकाली जाती हैं, कभी उसको न्याय देने के लिए राष्ट्रपति भवन का घेराव किया जाता है। कभी उसके अधिकारों पर अखबारों में लम्बे - चौड़े लेख लिखे जाते हैं तो कभी उसके सशक्तिकरण के लिए टेलीविजन में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। मगर क्या इन सब से कुछ फर्क पड़ रहा है ? अभी भी आये दिन हम कहीं तेजाबी हमलों की घटना सुनते हैं तो कहीं यौन हिंसा की घटना। शहर हों या बीहड़ औरत हों या छोटी बच्चियां, ऐसा लगता है महिलाऐं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। चारों और भय और निराशा का माहौल बनता जा रहा है। स्थिति वास्तव में इतनी बत्तर हो गई हैं या फिर इस बीच कुछ सकारात्मक भी हो रहा है ? हाँ, कुछ आशावादी लोग ये मान सकते हैं कि अब औरत अपने ऊपर होने वाले जुल्मो के खिलाफ आवाज उठा रही है। अब पुलिस थानो में पहले से ज्यादा शिकायतें दर्ज हो रही हैं। मगर क्या यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है ? क्या इससे महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा में कमी आयी है।
हिंसा में कमी आना एक अलग बात है और शिकायत करना एक अलग बात है। हमारा उद्देश्य क्या है ? क्या हम औरतों को एक शिकायती पिट्ठू बना कर रख देना चाहते हैं या हम चाहते हैं कि वास्तव में उनके खिलाफ होने वाली हिंसा बंद होनी चाहिए ? निश्चित रूप से हम चाहते हैं कि उन पर होने वाली हिंसा बंद हो। तो इसका समाधान क्या है ?
इसके समाधान के लिए अब तक कई उपाय सामने आये हैं जिनका कुछ महत्व तो है मगर कुछ सीमायें भी है। जैसे कोई कहता है कि " शिक्षा के माध्यम से लोगों को जागरूक करो। बच्चों को उनके बचपन से ही ये शिक्षा देनी चाहिए कि औरतों का सम्मान किया जाए ". मगर प्रश्न उठता है जो पढ़े लिखे नहीं हैं या जो बच्चे स्कूल नहीं जाते उन्हें कैसे जागरूक करें ? इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है। कोई कहता है "पुलिस व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, उनके ऊपर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए, उनकी गश्त बढ़ानी चाहिए, पुलिस सुधार के कार्यक्रम किये जाने चाहिए वगैरह - वगैरह। " अब प्रश्न उठता है कि पुलिस की गश्त बढ़ाने से उस औरत का क्या भला होगा जो अपने घर में ही असुरक्षित है ? और दूसरी बात यह कि पुलिस तो बाद में शिकायत दर्ज करेगी मगर हिंसा के समय उस औरत को कौन बचाएगा ? पुलिस का डर या क़ानून का डर ? ओह, यह एक बचकानी बात होगी ! क्यों कि क़ानून को लागू करने की शक्ति जिनके पास है वो खुद आत्मसमर्पण कर चुके हैं, डरे हुए हैं या महिलाओं के प्रति उनका नजरिया भी भोगवादी ही है। याद कीजिये दिल्ली के पूर्व कमिश्नर का बयान, गृह मंत्री का बयान या फिर उन नेताओं का बयान जो यौन हिंसा के लिए औरतों को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। महिलाओं के प्रति होने वाली इस प्रकार की हिंसा के समाधान की जब बात आती है तो कई लोग सख्त क़ानून की पैरवी करते हैं और इसी क्रम में वो हाथों में तख्तियां लेकर नारे लगाते हैं कि बलात्कारियों को फांसी दो। मगर क्या फांसी से इस तरह की घटनाएँ रुकेंगी ? इस पर कई लोगों ने आपत्तियां भी उठाई है जो कि काफी हद तक सही भी लगती हैं। क्यों कि इस प्रकार के क़ानून के दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। क्यों कि तब यौन हिंसा करने वाला व्यक्ति पीड़ित महिला की हत्या भी कर सकता है।
तो अब प्रश्न उठता है कि अब क्या किया जाए ? पुलिस से ज्यादा उम्मीद रखना बेमानी है, कानूनों की कमी नहीं है मगर वो भी अपराधियों को डराने में असमर्थ हैं और सरकारें तो बस बयानबाजी में ही लगी रहेंगी। सरकार के मंत्री और नेता या तो झूठी तसल्ली देंगे या फिर महिलाओं के ही चरित्र में उंगली उठा देंगे। वो महिलाओं को ही इन सबके लिए जिम्मेदार ठहरा देंगे।
निश्चित रूप से इन सबके लिए महिलाऐं स्वयं जिम्मेदार हैं मगर इसलिए क्योंकि वो कमजोर बनके रहती है, या वो ताकतवर बनना ही नहीं चाहती। अगर ऐसा नहीं होता तो किसी लड़की के मुह में तेज़ाब फेंकने कि योजना बनाने वाला व्यक्ति ऐसा करने से पहले हजार बार सोचता और हजारों बार सोचने पर भी वो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचता कि उसे ऐसा कुछ भी नहीं करना है क्यों कि ऐसा करने पर बचेगा वो भी नहीं। वह ऐसा क्यों नहीं सोचता कि लड़की के मुँह पर तेज़ाब फेंका तो बाद में वो भी उस लड़के के मुँह में तेज़ाब फेंक सकती है। किसी महिला या छोटी बच्चियों के साथ यौन हिंसा करने वाला व्यक्ति ये क्यों नहीं सोचता कि ऐसा करने पर वह महिला या उस बच्ची के परिजन उसे छोड़ेंगे नहीं और सम्भवतः बदले की कार्यवाही में उसके साथ भी किसी प्रकार की क्रूरता की जा सकती है मगर वो ऐसा नहीं सोचता क्योंकि उसे पता है वो औरत कमजोर है। बहुत सारे अपराध आंकड़े और सर्वे इस बात को प्रमाणित कर चुके हैं और अभी भी कर रहे हैं कि महिलाओं पर होने वाली ज्यादातर हिंसा के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं वो उन महिलाओं के परिचित होते हैं। अब चूंकि वो लोग उस औरत के परिचित होते हैं इसलिए वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि वो औरत कितनी कमजोर है। वे जानते हैं कि वो औरत क्या कर सकती है और क्या नहीं। और यदि हम उन सारी पीड़ित महिलाओं को देखें तो यह बात आसानी से समझ भी पाएंगे कि ज्यादातर मामलों में पीड़ित महिला की स्थिति हिंसा के समय कमजोर ही थी। इसीलिए ऐसी महिलाओं के साथ इस प्रकार की हिंसा होती है। क्योंकि हिंसा करने वाला व्यक्ति जानता है कि वो औरत ज्यादा से ज्यादा क्या करेगी ? थाने में जाएगी, अदालत में जाएगी, यहाँ-वहाँ धक्के खाएगी और फिर थक-हार के एक किनारे बैठ जाएगी। और इसीलिए उन हैवानों की इतनी हिम्मत बढ़ जाती है कि वो तेजाबी हमला हो या किसी भी प्रकार की यौन हिंसा, वो ऐसी वारदातों को अंजाम दे देते हैं।
अब ये महिलाओं पर निर्भर करता है कि वो वास्तव में कुछ बदलाव चाहती हैं या फिर पूरा जीवन इसी प्रकार दुखड़ा रोते हुए और अपना तमाशा बनाकर जीना चाहती है। कुल मिला कर महिलाओं को खुद ही सोचना होगा कि वो जो भी करे और जैसा भी करे कुछ ऐसा करे कि हमलावर मानसिकता वाले लोगों के मन में डर पैदा हो। इसके लिए जरूरी है कि महिलाऐं अपनी स्थिति मजबूत रखें। महिलाऐं कमजोर नहीं हैं मात्र इतने से कुछ नहीं होना है, वो कमजोर नहीं हैं ये सन्देश भी स्पष्ट रूप से समाज के हर तबके तक पहुंचना जरूरी है। महिलाओं को ये भी समझना होगा कि कमजोर का हर कोई या तो शोषण करता है या फिर उस पर दया दिखाता है मगर उसे सम्मान कोई नहीं देता। ये समाज, क़ानून, महिला आरक्षण, नैतिकता का आडम्बर, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया भी औरतों को उनका वह सम्मान नहीं दिला सकता जिसकी वे हक़दार हैं। उन्हें अपने सम्मान से जीने का अधिकार पाना हो या निर्भय होकर जीने की आजादी, ये उन्हें छीनकर ही मिलने वाली है क्यों कि याचना करके ये सब मिलना होता तो अब तक मिल चुका होता। अंतिम लड़ाई औरतों को ही लड़नी होगी, दुनिया से नहीं अपनी मानसिकता से, अपनी उस मानसिकता से जिसने उसको अबला बनने पर अभिशप्त किया है।
और अंत में :- जंगल में शेरों का झुण्ड जब शिकार करने जाता है तो वो भैंसों के झुण्ड में से सबसे कमजोर भैंसे को चुनते हैं, फिर सब उस कमजोर भैंसे पर टूट पड़ते हैं और अपनी प्रवृत्तियों के अनुसार भैंसों का झुण्ड शेरों से डर कर भागने लगता है और इसी भगदड़ में शेरों का झुण्ड उस कमजोर भैंसे को उसके झुण्ड से अलग करके उसको मार डालते हैं क्योंकि उस समय सारे भैंसे रक्षात्मक मुद्रा में रहते हैं। मगर कुदरत हमेशा एक ही नियम से नहीं चलती। कभी - कभी शेरों के हमले की स्थिति में कुछ भैंसे बिना डरे शेरों का मुकाबला करते हैं तो शेरों की भी हिम्मत नहीं होती कि वे हमला करें। शेर भले ही कितने भी भूखे क्यों न हों वो पीछे हट जाते हैं और भैंसों का शिकार होने से बच जाता है। मगर ऐसा हमेशा नहीं होता। कुदरत ने भैंसों को ऐसा दिमाग ही नहीं दिया है कि वो इस बात को समझ सकें कि वो चाहें तो वो भी शेरों को मार सकते हैं।
बात एकदम सीधी सी है - हम जानवर नहीं मनुष्य हैं और हमे यह समझने में परेशानी नहीं होनी चाहिए कि सारा खेल इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपना जीवन याचना करते हुए गुजारना चाहते हैं या रण करते हुए जीना चाहते हैं।