शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

काल्पनिक कहानियां उतनी भी काल्पनिक नहीं होतीं जितनी हम समझते हैं।

 पुरानी कहावत है कि 'धुआँ वहीं उठता है जहां कुछ सुलग रहा हो।'.... इसलिए हम ये कह सकते हैं कि काल्पनिक कहानियां उतनी भी काल्पनिक नहीं होतीं जितनी हम समझते हैं।.... मतलब ये कि अजीब से अजीब काल्पनाओं का भी कहीं न कहीं ठोस आधार जरूर होता है।

जैसे हम बॉलीवुड की कोई बेहतरीन फिल्म देख कर उसके लेखक की प्रशंसा करते हैं कि किस प्रकार उन्होने अपनी कल्पनाओं से एक बेहतरीन कहानी लिखी।..... लेकिन फिर पता चलता है कि बॉलीवुड की कितनी ही 'महान' फिल्में तो हॉलीवुड फिल्मों की नकल है।.... फिर तो असल प्रशंसा के पात्र हॉलीवुड के लेखक हैं।.... तो हॉलीवुड के लेखक क्या वाकई में इतने कल्पनाशील होते हैं !!.... नहीं।.... हॉलीवुड की भी बहुत सी फिल्मों मे बताया जाता है कि ये फलां-फलां उपन्यास पर आधारित है।.... इसका मतलब असल प्रशंसा उस उपन्यास के लेखक की होनी चाहिये।.... तो क्या वो उपन्यास का लेखक इतना कल्पनाशील है !!.... अब अगर उपन्यास के लेखक से पूछा जाता है तो अक्सर वो यही बताते हैं कि इस काल्पनिक कहानी की प्रेरणा उन्हें किसी सत्य घटना से मिली है।.... यानि बॉलीवुड की उस फिल्म की काल्पनिक कहानी पूरी तरह से काल्पनिक नहीं थी, उसका ठोस आधार उपन्यास के लेखक की निजी जिंदगी के अनुभव पर आधारित था।

ये तो थी बात सामान्य काल्पनिक कहानियों की, लेकिन जब हम बात करते हैं एलियंस और पारलौकिक शक्तियों वाली अजीबोगरीब कहानियों की तो क्या तब भी हम ये कह सकते हैं कि ये एलियंस और पारलौकिक शक्तियों की कहानियां सिर्फ खोखली कल्पनाएं नहीं हैं।.... उसका भी कोई न कोई ठोस आधार होगा।

जैसे जेम्स कैमरून की फिल्म 'अवतार' जब आयी थी तो हर जगह जेम्स कैमरून की प्रशंसा हो रही थी कि किस प्रकार उस फिल्म में एक रंगबिरंगी और अजीब से पेड़-पौधों वाले ग्रह 'पैंडोरा' की कल्पना की गई थी।

लेकिन जेम्स कैमरून की ये अजीबोगरीब दुनिया क्या वाकई में पूरी तरह से काल्पनिक थी ?.... इसका जवाब है नहीं।.... 

अवतार फिल्म में 'हवा में लटके पहाड़' चीन के 'झांगजियाजी नेशनल पार्क' जैसे दिखते हैं।

'आत्माओं वाले पेड़' की रंगीन लताओं की तरह ही जापान के आशिकागा फ्लावर पार्क के विस्टेरिआ पेड़ की लताएं भी विभिन्न रंगों के साथ चमकती हैं।

पेंडोरा के रंगीन जंगलों की तरह हकीकत में न्यूज़ीलैंड के 'वाईटोमो ग्लोवॉर्म गुफा' दिखती है।

इन सबके अलावा 'अवतार' फिल्म के जीवों का नीला रंग भगवान विष्णु के नीले रंग से प्रेरित होकर लिया गया था, वो भगवान विष्णु जो पौराणिक कथाओं के अनुसार समय-समय पर धरती पर अवतार लेते हैं।.... भगवान विष्णु के अवतारों से प्रेरित होकर ही फिल्म का नाम अवतार रखा गया था।

इसका मतलब अवतार फिल्म पूरी तरह से जेम्स कैमरून के दिमाग की कल्पनाएं नहीं थीं, या तो उन जगहों का अस्तित्व वास्तविक दुनिया में भी है या उस कल्पनिक कहानी का स्रोत कहीं और था।

अब अगर इस बात को मान लिया जाए कि "काल्पनिक कहानियां उतनी भी काल्पनिक नहीं होती.... उसका कोई ठोस आधार होता है" तो ये बात मेरे जैसे अनीश्वरवादी व्यक्ति को कुछ बैचैन करती है।.... दुनिया भर में होने वाली क्रूरता के बारे मे जान कर मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई भगवान जैसी चीज है।.... मुझे यही लगता है कि अपने अस्तित्व की शुरुआत में ही जब मनुष्य को कुछ समझ नहीं आया होगा, जब वो खुद को असहाय मानता रहा होगा तब उसने किसी ऐसे सर्व शक्तिमान की कल्पना की होगी जो उसे सारे संकटों से उबार लेगा।.... और उस सर्व शक्तिमान को उसने भगवान या ईश्वर नाम दे दिया होगा।.... उस पर भरोसा करके मनुष्य को कुछ हिम्मत भी मिली होगी इसलिये पीढी दर पीढी भगवान की उपासना करना और उस पर यकीन करना हमारे संस्कारों में मिल गया होगा।

वैसे ईश्वर को मानने वाले लोग अक्सर ये घिसा-पिटा तर्क देते हैं कि "इतना बड़ा ब्रह्माण्ड ऐसे ही तो बना नहीं होगा !!.... इसे किसी न किसी ने तो बनाया ही होगा !!".... अगर ऐसा है तो फिर सवाल उठता है कि भगवान को किसने बनाया ?.... तो फिर वो कहते हैं कि "भगवान खुद ही बने हैं।".... तो भगवान खुद बन सकते हैं तो ब्रह्माण्ड खुद क्यों नहीं बन सकता ?.... ये ठीक है कि ब्रह्माण्ड एक ऊर्जा से बना है लेकिन उस ऊर्जा की हम पूजा करने लग जाएं ये सोच कर कि इससे वो ऊर्जा हमारे ऊपर कृपा बरसा देगी.... ये तो हद है।

अब वैसे एक बारी के लिए ईश्वर पर यकीन किया जा सकता है लेकिन जब हम दुनिया में होने वाली क्रूरताओं को देखते हैं तो लगता है कि जिन लोगों के साथ ये क्रूरता होती हैं क्या वो ईश्वर को नहीं मानते थे ?.... या वो ईश्वर की पूजा नहीं करते थे ?.... यहां तक कि संकटों के घिरने पर भी लोग भगवान को याद करते हैं, उन्हें पुकारते हैं.... लेकिन क्या भगवान उनकी मदद करते हैं ?..... नहीं, छोटे-छोटे अबोध बच्चों के साथ भी क्रूरताएं हो जाती हैं जिन्हें न तो भगवान के बारे में पता है न शैतान के बारे में।..... इसलिये लगता है कहीं कोई भगवान नहीं है, ये सिर्फ हमारे मन की तसल्ली के लिए हमने कल्पनाएं गढ ली हैं।

लेकिन जब बात आती है कि 'कल्पनाएं हवा में नहीं होतीं, उसका कोई ठोस आधार जरूर होता है'..... तो यह बात बैचेन भी करती है कि अगर मनुष्य ने भगवान की कल्पना की थी तो क्या वो कल्पना पूरी तरह से खोखली नहीं थी ?..... क्या आदिम मनुष्य ने वास्तव में भगवान जैसे सर्व शक्तिमान का अस्तित्व महसूस किया था ?