शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

हिंदी न्यूज़ चैनलों में पत्रकारों और पत्रकारिता की बदलती तस्वीर

अगर आपसे पूछा जाए कि 'आज तक' न्यूज चैनल नम्बर 1 क्यों है ? तो अधिकतर लोगों का जवाब होगा कि उसमें बढ़िया-बढ़िया शो (चर्चा-बहस) चलते हैं।..... आज 'आज तक' की लोकप्रियता उसके शो के कारण है लेकिन 10-12 साल पहले एक समय ऐसा भी था जब 'आज तक' में एक भी शो नहीं चलता था। वो सिर्फ खबरें दिखाता था और तब भी नंबर वन था।..... ये वही समय था जब चर्चा-बहस वाले शो के लिए ndtv सबसे प्रसिद्ध था।..... आज 'आज तक' का सबसे ज्यादा जोर अपने भव्य शो के लिए रहता है ऐसा ही तब उसका सबसे ज्यादा जोर 'ब्रेकिंग न्यूज़' पर रहता था।..... कोई भी बड़ी खबर होती थी तो लोग सबसे पहले 'आज तक' देखना पसंद करते थे।..... लेकिन फिर धीरे-धीरे बहुत कुछ बदल गया। 'आज तक' ने बड़ी ही समझदारी से अपनी रणनीति बदलते हुए 'ब्रेकिंग न्यूज' के आग्रह को छोड़ते हुए चर्चा-परिचर्चा वाले शो करने शुरू कर दिए।

क्योंकि अब देश में बहुत कुछ बदलने लग गया था।..... पहले देश में 'ब्रेकिंग न्यूज़' किस बात को लेकर देखी जाती थी ? ...... या तो बम धमाकों को लेकर या साम्प्रदायिक दंगों को लेकर।..... कहीं भी खबर आती थी कि फलां-फलां शहर में आतंकियों ने बम धमाका कर दिया या किसी शहर में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए हैं। तो उसकी सबसे पहले और सबसे विस्तृत खबर 'आज तक' में देखी जाती थी।...... ये वही समय था जब टेलीविजन पत्रकारिता के बड़े-बड़े नाम राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त, रवीश कुमार, दीपक चौरसिया, विनोद दुआ जैसे लोग अपनी रिपोर्टिंग के कारण ही इतने प्रसिद्ध हुए।

और पिछले 5 सालों में तो बहुत कुछ बदल गया।.... देश के राजनैतिक और आर्थिक हालातों ने टेलीविजन पत्रकारिता को लगभग पूरा का पूरा बदल दिया।..... एक तो अब हमारे शहरों में पहले जैसे बम धमाके होने बंद हो गए हैं दूसरा न्यूज़ चैनलों को अपने आर्थिक संसाधनों को समेटना भी पड़ा है।...... हालांकि इस अर्थिक उथल-पुथल की नींव 10 साल पहले दिल्ली से बहुत दूर अमेरिका में पड़ी थी, जब 2008 में अमेरिका का 'लीमन ब्रदर्स' बैंक डूब गया था और अमेरिका सहित पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी छाने लगी थी।..... इसका कुछ असर न्यूज़ चैनलों के बिज़नेस पर भी पड़ा और उन्हें अपने आर्थिक संसाधनों को समेटना पड़ा।..... ये असर अभी भी न्यूज़ चैनलों पर काफी हद तक पड़ा हुआ है।..... परिणामस्वरूप न्यूज़ चैनलों ने रिपोर्टिंग पर खर्चे कम कर दिए।..... एक तो अब देश में 'ब्रेकिंग न्यूज' के लिए कांड होने बंद हो गए हैं दूसरा तमाम रिपोर्टिंग पर खर्चा करना बेकार है।..... अब कोई चैनल 20 रिपोर्टर भी फील्ड में भेजेगा तो 20 लोगों का खर्चा उठाना पड़ेगा।..... इसलिए अब लगभग सभी चैनल 'नई खबरों' के लिए न्यूज़ एजेंसियों से ही खबरें उठाना पसंद करते हैं।..... रिपोर्टर सामान्य किस्म की रिपोर्टिंग के लिए रखे हुए हैं।...... इसीलिए अब हम देखते हैं कि लगभग सभी न्यूज़ चैनलों में एक जैसी खबरें होती हैं।

और इसके साथ ही पत्रकारों की स्थिति भी बदल चुकी है।..... पहले राजदीप, बरखा दत्त और रवीश कुमार अपनी रिपोर्टिंग के कारण प्रसिद्ध होते थे वहीं अब प्रसिद्ध होने वाले पत्रकार वो हैं जो टीवी बहस में एंकरिंग करते हैं।..... जैसे रोहित सरदाना, अंजना ओम कश्यप, मनक गुप्ता।..... आज हम किसी टेलीविजन पत्रकार को उसकी रिपोर्टिंग के लिए नहीं जानते, हम किसी को जानते हैं तो सिर्फ इसलिए कि वो फलां-फलां शो में एंकरिंग करता है।

तो इस तरह 5-10 सालों में टेलीविजन पत्रकारिता काफी कुछ बदल चुकी है।..... लेकिन एक चीज ऐसी है जो नहीं बदली। वो है टेलीविजन पत्रकारों का एजेंडा सेट करना।..... पहले पत्रकार रिपोर्टिंग करके अपना एजेंडा सेट करते थे वैसे ही एजेंडा अब एंकर चर्चा-बहसों के द्वारा सेट करते हैं।