बुधवार, 2 मई 2018

वॉयजर : सौरमंडल के बाहर इंसानों के निशान।

इस समय हम इंसानों का एक 'दूत' हमारी पृथ्वी की तस्वीरें, इंसानों और जानवरों की आवाज की रिकॉर्डिंग हमारे सौरमंडल के पार लेकर जा चुका है। यानि ये सौरमंडल के सबसे दूर स्थित ग्रह अरुण, वरुण से भी आगे वहां जा चुका है जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुँच पता।....... इंसानों का ये दूत दुनिया की जिन-जिन भाषाओं का संदेश लेकर गया है उनमें एक हिंदी का सन्देश भी हैं।
दरअसल नासा ने हमारे सौरमंडल के बाहरी ग्रहों - शनि, बृहस्पति, अरुण और वरुण ग्रहों के अध्ययन के लिए आज से 40 साल पहले 1977 में दो अन्तरिक्षयान प्रक्षेपित किये थे। वॉयजर 1 (Voyager 1) और वॉयजर 2 (Voyager 2)...... दोनों का काम था हमारे सौरमंडल के बाहरी ग्रहों की जानकारी पृथ्वी पर भेजना और फिर अनंत अंतरिक्ष की ओर आगे बढ़ जाना। वॉयजर का इंग्लिश में मतलब होता है 'समुद्री यात्री'। जिस तरह समुद्री यात्री बहुत दूर तक यात्रा करते हैं उसी तरह नासा के ये यान भी अंतरिक्ष की अनंत यात्रा पर निकल पड़े हैं। 

इन यानों के साथ एक रोमांचक बात ये भी है कि इन यानों में एक डिस्क भी लगी हुई है। जिसमें पृथ्वी के जीव-जंतुओं की तस्वीरें, उनकी आवाजें, सौरमंडल में पृथ्वी की स्थिति की जानकारी हैं।...... क्योंकि नासा को ये सम्भावना लगी कि चूंकि इन यानों को सुदूर अंतरिक्ष में आगे बढ़ जाना था तो कभी भविष्य में ये अंतरिक्षयान किसी बुद्धिमान परग्रहीय प्राणियों के संपर्क में आ सकते हैं। इसलिए नासा ने इन यानों में एक डिस्क लगा दी जिसमें दुनिया की कई भाषाओँ में उन परग्रहियों के लिए सन्देश हैं। भारतीय भाषाओँ में हिंदी, मराठी, कन्नड़, बंगाली, उर्दू, राजस्थानी, पंजाबी में ये सन्देश रिकॉर्ड हैं। 

इस समय वॉयजर 1 पृथ्वी से लगभग 21 अरब किलोमीटर दूर हमारे सौर मंडल के बाहर जा चुका है।..... सामान्यतः जब हम सौरमंडल की बात करते हैं तो ज्यादातर को लगता है कि ये अरुण, वरुण जैसे ग्रहों तक फैला हुआ है। क्योंकि सौरमंडल की ज्यादातर तस्वीरों में हम यही देखते हैं। जब कि ऐसा नहीं है...... सौरमंडल इन ग्रहों से भी आगे तक फैला हुआ है। हमारे सभी ग्रह तो हमारे सौरमंडल का केवल 10% हिस्सा हैं। 
Voyager Location on Space / Image Courtesy : NASA

सौरमंडल यानि सूर्य का इलाका उसके चारों ओर घूमने वाले ग्रहों से नहीं बल्कि सूर्य के गुरुत्व क्षेत्र से मापा जाता है, जिसे Heliosphere कहते हैं जो कि इन ग्रहों से कई अरब किलोमीटर आगे तक फैला हुआ है। (सलंग्न चित्र में नीला भाग)..... सूर्य के गुरुत्व क्षेत्र से आगे अंतरतारकीय क्षेत्र ('इंटरस्टेलर स्पेस') (Interstellar Space) शुरू हो जाता है। (अंतरिक्ष में किसी तारे के प्रभाव क्षेत्र की सीमा से आगे की जगह को इंटरस्टेलर स्पेस कहते हैं।) इसी इंटरस्टेलर स्पेस में वॉयजर 1 जा चुका है। और कुछ ही सालोँ में वॉयजर 2 भी वहां पहुंच जाएगा। ये दूरी इतनी है कि इस समय वॉयजर 1 से आने वाले रेडियो सिग्नल 19 घंटे में पृथ्वी तक पहुंचते हैं। वो भी तब जब ये रेडियो सिग्नल प्रकाश की चाल से चलते हैं।....... यानि 1सेकेंड में 3 लाख किलोमीटर। संलग्न चित्र में वॉयजर 1 और वॉयजर 2 की स्थिति देखी जा सकती है। नीला भाग (Heliosphere) हमारे सौर मंडल का क्षेत्र है। उसके अंदर एक छोटी सी डिस्क जैसी संरचना में हमारे सभी ग्रह हैं। और वॉयजर 1 इस नीले क्षेत्र (Heliosphere) के बाहर जा चुका है। (चित्र साभार : NASA)

इन यानों से रेडियो सिग्नल अभी भी मिल रहे हैं और संभवतः 2020 तक मिलते रहेंगे। इनकी ऊर्जा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसलिए ऊर्जा बचाने के लिए इनके कई उपकरण बंद कर दिए गए हैं। इसके कैमरे भी बंद कर दिए गए हैं। क्योंकि जहां यह यान पहुंच चुका है वहां सिवाय घुप अंधेरे के कुछ नहीं है।...... हालाँकि जब इनकी ऊर्जा पूरी तरह खत्म हो जाएगी तब भी ये अंतरिक्ष में आगे बढ़ते रहेंगे। क्योंकि अंतरिक्ष में इन्हें रोकने के लिए गुरुत्वाकर्षण जैसा कोई अवरोध नहीं हैं बस इससे सिग्नल आने बंद हो जाएंगे।...... और तब ये यान हमेशा-हमेशा के लिए पूरी तरह इंसानों से अलग हो जाएंगे। 

वॉयजर 1 सौरमंडल के बाहर जा चुका है लेकिन अभी भी वो इंसानों से जुड़ा हुआ है। लेकिन जब इसके सिग्नल आने बंद हो जाएंगे तब इसे हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कहना पड़ेगा।...... और वो समय खगोलीय घटनाओं में रुचि रखने वालों के लिए भावुक पल होगा।..... वॉयजर भले ही ब्रह्मांड में किसी दूसरी सभ्यता को न मिले तब भी इन यानों का महत्व कम नहीं होगा।...... वॉयजर इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि ये इंसान की बनाई हुई पहली ऐसी चीज है जिसे इंसान ने सूर्य के प्रभाव क्षेत्र से भी बाहर भेज दिया है। वॉयजर सिर्फ अंतरिक्षयान नहीं है..... ये इंसानी कल्पनाओं और क्षमताओं की उड़ान के प्रतीक भी हैं।