गुरुवार, 31 अगस्त 2017

तुम्हारी भक्ति मूर्खता, मेरी भक्ति समझदारी ?

कई लोग गुरमीत राम रहीम के बहाने अन्य बाबाओं को निशाने पर ले रहे हैं। और ऐसे बाबाओं के भक्तों की बुद्धि, विवेक पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं। कुल मिलाकर सभी ये साबित करना चाहते हैं मानों इन बाबाओं के भक्त मूर्ख हैं, विवेकहीन हैं और खुद वो लोग बड़े समझदार हैं।
भाई ये विवेकहीनता की समस्या अकेले उन बाबाओं के भक्तों की नहीं है बल्कि हम सभी की है। मगर हमें आदत पड़ी हुई है कि हम खुद को बहुत होशियार मानते हैं और दूसरों को बुद्धिहीन। अब देखो न, कुछ लोग कहते हैं कि इन बाबाओं के चक्कर में मत पड़ो, अपने देवी-देवताओं की पूजा करो। और यही देवी-देवताओं की बात करने वाले देवी-देवताओं को 'खुश' करने के लिए तमाम तरह के टोने-टोटके करते हैं, निरीह पशुओं की बलि देते हैं। जो बाबाओं के पीछे जा रहे हैं उनमें दिमाग नहीं है तो जो धर्म के नाम पर जानवरों की बलि देने की बात जो पण्डे-पुजारी और उनके यजमान करते हैं वो क्या बहुत दिमाग वाली बात करते हैं ?
और सिर्फ बलि देने की ही बात नहीं है, अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे हमारा आज का हिन्दू धर्म पूरी तरह खौफनाक कहानियों से भरा पड़ा है। अगर औरत ने ब्रत तोड़ा तो पति मर गया, पति ने गलत मन्त्र पढ़ा तो पत्नी मर गई, धार्मिक अनुष्ठान ठीक से नहीं किये तो बच्चा मर गया। क्या है ये ? ये हिन्दू धर्म है क्या ? भगवान् को इतना मेन्टल समझा है क्या, कि ब्रत तोड़ देने से वो पति, पत्नी या बच्चे को मार डाले। हमारे पंडित-पुजारी धर्म का ज्ञान कम देते हैं, डराते ज्यादा हैं। बाबाओं के पीछे जाने वाले लोग विवेकहीन होते हैं तो ये पण्डे-पुजारियों की बातों से डरने वाले लोग क्या बहुत विवेकशील होते हैं ?
हम लोगों ने आज अपने धर्म को वो बना दिया है जिसमें हम भगवान् को मानते नहीं हैं, उससे डरते हैं। और ये डर हिन्दू समाज में किस हद तक घुस चुका है इसका उदाहरण देखिये - कई बार बात उठती है तो मैं लोगों को कहता हूँ मैं भगवान् को नहीं मानता। हालाँकि मेरे ऐसा कहने का मतलब ये नहीं होता कि अगर वो भगवान को मानते हैं तो वो गलत हैं। मैं तो बस अपना मत रखता हूँ, वो भी कभी इस विषय पर चर्चा हो रही हो तो। तो जब मैं ऐसा कहता हूँ कि मैं भगवान् के अस्तित्व को नहीं मानता तो लोग झट से कहते हैं भाई मान जाएगा। मैं कहता हूँ कैसे मान जाऊँगा ? तो वो फिर कहते हैं भाई तू देखता रह एक दिन तू सब मानेगा। मैं फिर पूछता हूँ भाई आखिर ऐसे कैसे मान जाऊँगा ? तो कहते हैं "जिस दिन तेरे साथ कुछ बुरा होगा उस दिन तू सब मानने लगेगा।" अब बताओ ये क्या बात हुई ! तो मैं उन्हें कहता हूँ भाई तू मुझे बता रहा है या धमका रहा है ? भगवान् को लेकर उसकी क्या समझ है वो नहीं बताएगा, क्योंकि उसकी कोई समझ ही नहीं है तो बताएगा क्या ? उसने भगवान् से डरना सीखा है तो मुझे भी डरा ही रहा है। तो फिर मैं ऐसे लोगों को कहता हूँ "ठीक है भाई जिस दिन मेरे साथ कुछ बुरा होगा उस दिन मैं भगवान् को मानने लगूंगा मगर तू तो आज भगवान् को मानता है ? तेरे साथ कुछ बुरा नहीं होगा, है न ?" बुरा-भला तो सबके साथ ही होना है, उसमें भगवान को मानने न मानने का क्या मतलब ? गजब का विवेक और बुद्धिमानी है भाई लोगों की ! खुद तो डरे हुए हैं, मुझे भी डरा रहे हैं।
अब इन्हीं डरे-घबराए लोगों में से कुछ लोग जो वास्तव में ईश्वरीय ज्ञान की तलाश में रहते हैं उन्हें कौन ज्ञान देगा ? जिन पण्डे-पुजारियों और मठाधीशों पर जिम्मेदारी थी धर्म का ज्ञान देने की वो तो डरा रहे हैं। तो ऐसे में उदय होता है बाबा लोगों का। आप उन बाबाओं का मजाक उड़ा सकते हो मगर याद रखो वो लोगों को धर्म और भगवान् के नाम पर डराते नहीं हैं, वो ईश्वर के बारे में ज्ञान देते हैं। अब इन बाबाओं का ईश्वर को लेकर जो ज्ञान है वो सही है या नहीं वो अलग विषय है लेकिन कम से कम वो लोगों को कुछ बताते तो हैं, भगवान् के नाम पर डराते तो नहीं हैं। और यही बात लोगों को सही लगती है।
ये समय बाबा लोगों की आलोचना का नहीं हमारे अत्ममंथन का है। हमारे धर्म को सुधार की जरूरत है। सनातन धर्म आदि-अनादि काल से क्या है, कैसा है उसे जन-जन तक पहुँचाने की जरूरत है। हिन्दू धर्म में महंत, पुरोहित, महामंडलेश्वर, अखाड़ा परिषद्, शंकराचार्य जैसी तमाम व्यवस्थाओं में सुधार की जरूरत है।
पुनश्च :- आपको इस बात में हैरानी हो सकती है कि अगर मैं भगवान् को नहीं मानता तो मैं मंदिर क्यों जाता हूँ ? मैं हवन क्यों करता हूँ ? हिन्दू धर्म की इतनी चिंता क्यों कर रहा हूँ ? तो आपको बता दूँ हमारी सनातन परम्परा में अस्तिकवाद और नास्तिकवाद हमेशा से रहे हैं। यही तो हिन्दू धर्म की विशेषता है कि आप भगवान् को नहीं मानते तो भी हिन्दू होते हो। आप भगवान् को नहीं मानते तो इसका मतलब ये थोड़े ही है कि आपको मंदिर भी नहीं जाना चाहिए। लेकिन कई लोगों को लगता है कि भगवान् को नहीं मानते तो मंदिर क्यों जाना ? इसीलिए तो कहा मैंने, हिन्दू धर्म में सुधार की आवश्यकता है। मैं भगवान् को नहीं मानता लेकिन अपनी धार्मिक और सांकृतिक विरासत को तो मानता हूँ। हम भगवान् को माने या न माने लेकिन भगवान्, ईश्वर और देवी-देवताओं को लेकर हमारे सनातन धर्म में जो अवधारणाएं हैं उन्हें तो जानना ही चाहिए। स्वामी विवेकानंद भी एक समय तक भगवान् को नहीं मानते थे जब तक कि उन्हें गुरु रामकृष्ण परमहंस नहीं मिल गए। भगवान् को न मानना मेरे लिए भी कोई प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। भगवान् के होने का औचित्य मुझे समझ नहीं आता इसलिए भगवान् को नहीं मानता, जिस दिन समझ में आ जाएगा उस दिन शायद मानने भी लगूंगा।