हमारे लिए सहिष्णुता जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी असहिष्णुता भी है। कहते हैं जरूरत से ज्यादा कोई भी चीज ठीक नहीं होती। और हर चीज थोड़ी-थोड़ी होनी भी जरूरी है। देश की आजादी के समय हमने देश के विभाजन की मांग करने वालों के खिलाफ यदि असहिष्णुता का परिचय दिया होता तो हमारी इस पवित्र भूमि का विभाजन नहीं होता। और ना ही आज हमारी ही भूमि के टुकड़े में खड़ा पाकिस्तान हमारी नाक में दम करता। अब ये मत कहना कि अगर हम असहिष्णुता दिखाते तो हमारे देश में गृह युद्ध हो जाता। क्यों कि इतना समझ लो कि नाम आप भले ही उसे गृह युद्ध का न दो मगर सच्चाई यही है कि उस समय सहिष्णुता के रास्ते पर चलने पर भी लोगों का कत्लेआम वैसा ही हुआ था जैसा गृह युद्ध में होता है। लाशें तो गिरनी ही थी और गिरी भी। मगर हम थोड़ी असहिष्णुता दिखाते तो देश का विभाजन नहीं होता। इसलिए ये जरूरी है कि सहिष्णुता के साथ-साथ कभी-कभी हम असहिष्णुता का भी परिचय दें। मगर हमें ध्यान रखना चाहिए कि इन दोनों के बीच हम कैसे संतुलन बनाए रख सकते हैं। हमें इतना भी असहिष्णु नहीं होना चाहिए कि कल को कोई रत्नाकर डाकू अगर ऋषि वाल्मीकि बनना चाहे तो समाज उसे स्वीकार न करें। मगर हमारे अंदर इतनी सहिष्णुता भी नहीं होनी चाहिए कि मुस्लिम आक्रमणकारी हमारे ऊपर हमला करके हम पर ही राज करने लगे और उसके बाद हमें ही भाई-चारे का पाठ पढाने लगे और हम सहिष्णुता के साथ उनके प्रवचन सुनते रहें। हमारे अंदर इतनी असहिष्णुता भी नहीं होनी चाहिए कि समाज की रूढ़िवादियों के खिलाफ उठने वाली भगवान् बुद्ध और महावीर स्वामी की आवाज को भी दबा दिया जाए मगर इतनी सहिष्णुता भी नहीं होनी चाहिए कि कोई मैकाले या उसके जैसे अंग्रेज हमारी संस्कृति को ही रूढ़िवादी बता दें और हमारी संस्कृति को नीचा दिखाती शिक्षा हमें दें तो हम भी उनकी दी हुई शिक्षा में पी.एच.डी. करने लग जाएं। हमें इतना असहिष्णु भी नहीं होना चाहिए कि खजुराहो के मंदिरों में हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न मूर्तियां हमें क्रोधित कर दें मगर हमें इतना भी सहिष्णु नहीं होना चाहिए कि कोई भी एम. एफ. हुसैन सरीका अपना मुंह उठाके हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीर बानाने लगे और हम उसे चुप-चाप बर्दाश्त कर लें। हमें इतना भी असहिष्णु नहीं होना चाहिए कि पारंपरिक हिन्दू मान्यताओं का विरोध करने वाले स्वामी दयानंद को हम गालियां देने लगें मगर इतना भी सहिष्णु नहीं होना चाहिए कि वामपंथियों द्वारा अपनी राजनैतिक दुकान चलाने के लिए जब वो हिन्दू मान्यताओं और प्रतीकों का अपमान करने लगें तो हम चुप-चाप उसे भी स्वीकार कर लें। हमारे देश के लिए असहिष्णुता नहीं बल्कि हमें कब सहिष्णु होना है और कब असहिष्णु इसकी समझ विकसित करना सबसे बड़ी चुनौती है। हमें सहिष्णुता का परिचय देना है या असहिष्णुता का इसका फैसला करने से पहले समझ लेना चाहिए कि हमारी आलोचना करने वाले का उद्देश्य क्या है ? उसकी मानसिकता क्या है ? वो कौन है और वो क्या है ? क्यों कि हम ज्यादा ही सहिष्णु होने लगे तो दमन का शिकार होंगे और ज्यादा ही असहिष्णु होने लगे तो खुद ही अत्याचारी और रूढ़िवादी बनने लगेंगे।