शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

आरक्षण : क्या था क्या हो गया ?

अच्छे - खासे पढ़े - लिखे और खाते - पीते पटेल समुदाय के कुछ लोग गुजरात में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। और न केवल मांग कर रहे हैं बल्कि सरकार को धमका भी रहे हैं। कल तक जाट और गुर्जर आरक्षण की मांग कर रहे थे और अब ये पटेल शुरू हो गए हैं। दरअसल इन लोगों ने आरक्षण जैसे विषय को मजाक बनाके रख दिया है। जिसके मन में आता है मुँह उठा के आ जाता है आरक्षण मांगने। जब देश आजाद हुआ था तब संविधान बनाने वालों ने देश में दलितों और पिछड़ों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए नौकरियों और शिक्षा में उनके लिए कुछ जगह आरक्षित की थी और ऐसा केवल इसलिए नहीं किया गया कि उस समय वो बहुत पिछड़े हुए थे बल्कि इसलिए किया गया था क्यों कि उस समय तक और काफी हद तक अभी भी समाज के लोगों में उन दलितों और जनजातियों के प्रति समानता का भाव नहीं था। उनका शोषण किया जाता था, उनके साथ भेदभाव किया जाता था, उन्हें कई अधिकारों से वंचित रखा जाता था। संविधान निर्माताओं को आशंका थी कि यदि इन दलितों और उपेक्षितों को समाज के भरोसे छोड़ दिया गया तो समाज का प्रभावशाली वर्ग उन्हें कभी आगे नहीं बढ़ने देगा। इसलिए उन दलितों और उपेक्षितों को आरक्षण देकर ये सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि वो भी समाज के साथ - साथ आगे बढ़ें और सम्मान के साथ जीवन जिएं। अब पटेल समुदाय के कुछ लोग या उनके जैसे अन्य जातियों या समुदाय के लोग जो आज आरक्षण की मांग करते हैं क्या समाज में वो भी भेदभाव का शिकार हुए हैं या समाज में प्रगति करने के लिए किसी ने उन्हें कभी रोका ? नहीं। तो फिर उन्हें आरक्षण क्यों ? केवल इसलिए कि उन्हें लगता है कि वो पिछड़ रहे हैं और हजारों की संख्या में सड़कों में उतरकर वो सरकार को धमका सकते हैं। अगर मात्र पिछड़ना ही आरक्षण का मापदंड होगा तो शायद पूरे देश को आरक्षण देना पड़ जाएगा। क्यों कि देश के लगभग हर नागरिक को ये लगता है कि वो पिछड़ गया है। ये लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र है और जितनी जल्दी ये परंपरा ख़त्म हो जाए उतना देश और समाज के लिए अच्छा है।

और अंत में :- आज जिस गुजरात में पटेलों के आरक्षण की मांग उठ रही है, देश की आजादी के समय उसी गुजरात की जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय करवाने वाले जो उस समय के गृह मंत्री थे वो सरदार बल्लभ भाई भी पटेल थे और उसी गुजरात की जिन मुख्यमंत्री के कार्यकाल में ये मांग उठ रही है वो आनंदी बेन भी पटेल हैं। फिर भी कुछ पटेलों को लगता है कि उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए।

रविवार, 9 अगस्त 2015

क्या हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हार रहे हैं ?

टेलीविजन चैनलों में दिखाई दिया कि आतंकी नावेद पकड़ा गया है। उसे सुरक्षाबलों ने घेरा हुआ है, उसके हाथ बंधे हुए हैं और वो मुस्कुरा रहा है, उसके चेहरे पर कोई शिकन, कोई चिंता, कोई डर के भाव नहीं दिख रहे हैं। वो दुश्मनों से घिरा होने के बावजूद एक सूरमा की तरह शान से खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। और ये हमारी आतंक के खिलाफ सबसे बड़ी हार है। दरअसल उसके बयान और उसकी मुस्कुराहट कुछ और नहीं बस हमें हमारी औकात बता रही है। उसका ये बेख़ौफ़ अंदाज मानो हमसे कह रहा हो कि तुम्हें जो उखाड़ना है उखाड़ लो हम तुम्हे पहले भी बजाते आये हैं और आगे भी बजाएंगे। और ये कोई पहली बार की घटना नहीं है जब कोई आतंकी हमें हमारी औकात बता रहा हो। इससे पहले हमें याद है जब भटकल पकड़ा गया था तो वो मीडिया के सामने अपनी उंगलियों से इंग्लिश के v का निशान दिखा रहा था जिसका इंग्लिश में मतलब होता है victory यानि जीत। मतलब गिरफ्तार होने के बाद भी उसका हौंसला बुलंद है और उसकी अकड़ कम नहीं हुई है।
             अब ये सब घटनाएं जो हमें हमारी औकात बता रही हैं दरअसल उसके लिए हमारे सुरक्षाबल ही जिम्मेदार हैं जब भटकल मीडिया के सामने उँगलियाँ दिखाकर विजय का निशान बना रहा था तभी उसकी दोनों उँगलियाँ क्यों नहीं तोड़ी गई ? जब वो नावेद हमारे जवानों की गिरफ्त में होने के बावजूद मुस्कुरा रहा था तो उसके हाथ - पैर क्यों नहीं तोड़े गए ? चलो मान लेते हैं कि इन आतंकियों से और अधिक जानकारी पाने की एक कूटनीतिक मजबूरी हो सकती है जिस कारण हमारे जवान इनके इस दुस्साहसी व्यवहार का उसी समय मुँहतोड़ जवाब नहीं दे पाते। मगर बाद में ? बाद में तो ये पवित्र कार्य किया जा सकता है। अपने काम की जानकारी पाने के बाद तो भटकल की टूटी हुई उँगलियाँ मीडिया के सामने दिखाई जा सकती थी। मगर ऐसा नहीं हुआ और नावेद के मामले में भी शायद ऐसा नहीं होगा। हमारे नेता और जवान आतंक के खिलाफ बस बयान ही देते रहेंगे और वो हमें हमारी औकात बताते रहेंगे।
               हमें इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि चंद आतंकियों को फाँसी दे देने से हम आतंक के खिलाफ लड़ाई जीत जाएंगे। वो हमारे दस लोगों को मार देंगे, हम उनके चार आतंकी मार देंगे। इस तरह भेड़ - बकरियों की तरह लड़ कर ये जंग नहीं जीती जा सकती। एक बात हम सभी को अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि ये पारंपरिक जंग नहीं है ये आतंक की लड़ाई है और इस लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है इसका फैसला इस बात से होगा कि आतंकित कौन है ? वो या हम ? अब देखा जाए तो साफ़ दिखता है कि वो हमें डराने में कामयाब होते जा रहे हैं। आज आप कोई सरकारी काम कराने जाइए पहले जहाँ दो कागजों मे आपकी पहचान प्रमाणित हो जाती थी वहीँ आज आपको दस तरह के कागज लगाने पड़ते हैं। अब आप आप ही हो ये प्रमाणित करने के लिए दस कागजों के लिए आपको दस जगह चक्कर भी लगाने पड़ते हैं। आखिर परेशान कौन हुआ ? आप ही ना। और ये सब क्यों होता है ? ताकि अच्छी तरह से ये जांच लिया जाए कि आप आप ही हो कोई आतंकी नहीं। जब आतंकवाद इतना नहीं फैला था तब दो कागज में आसानी से काम हो जाता था आज आतंकवाद इतना फ़ैल गया है तो आपको कोई भी काम करने के लिए यहाँ - वहां भागना पड़ता है। तो सोचो कौन जीता आतंकी या हम ? और यही नहीं देश में कोई त्यौहार आता है तो हमारा सुरक्षा तंत्र एकदम से घबराने लगता है। कहीं हाई अलर्ट जारी हो जाता है तो कहीं सड़के बंद कर दी जाती हैं। माहौल में एक अजीब सी बैचेनी, एक तनाव पैदा कर दिया गया है। और ये सब इसीलिये हो रहा है क्योंकि हम आतंकित हैं। पलड़ा उनका भारी होता जा रहा है।