बुधवार, 18 दिसंबर 2013

विकास या छलावा : क्या यही चाहा था उत्तराखण्ड ने ?



"सब्बि धाणी देहरादून, हूण खाणी देहरादून " अर्थात सब कुछ देहरादून में, खाना पीना और सब कुछ होना भी देहरादून में।उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध गढ़वाली लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी द्वारा यह गीत उत्तराखंड की एक समस्या पर प्रकाश डालता है। इस गीत के माध्यम से उन्होंने उत्तराखण्ड के लोगों की पीड़ा को सामने रखा था।  और वह पीड़ा है एक तरफ़ा विकास। इसी पीड़ा के कारण उत्तराखंड निर्माण के लिए लोगों ने आंदोलन किया था और अलग राज्य बनवाया।  

उत्तराखण्ड हो या कोई भी नए बनने वाले राज्य उनके गठन के मूल में एक ही बात होती है और वह है विकास के आधार पर भेदभाव। अर्थात किसी राज्य में वहाँ की सरकार द्वारा जब अपने ही राज्य के किसी क्षेत्र विशेष की लगातार उपेक्षा की जाती है और उस उपेक्षित क्षेत्र के लोग ये मान लेते हैं कि अब उन्हें अलग राज्य के रूप में मान्यता मिलनी ही चाहिए ताकि वे खुद अपने क्षेत्र के विकास के लिए काम कर सकें , तब वे अलग राज्य के लिए संघर्ष करते हैं। उत्तराखण्ड, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में यही हुआ और इसी कारण अब तेलंगाना राज्य के गठन की मांग वहाँ के लोगों के द्वारा की जा रही है। 

अब प्रश्न उठता है कि क्या अलग राज्य बनने से वो सारी समस्याएं सुलझ जाती हैं जिनसे छुटकारा पाने के लिए लोग अलग राज्य के लिए संघर्ष करते हैं। तो इसका जवाब होगा शायद हाँ.... या शायद नहीं। अब उत्तराखण्ड के उदाहरण से समझते हैं - निश्चित रूप से उत्तराखण्ड बनने से इस क्षेत्र में कुछ ढांचागत सुधार देखने को जरूर मिला है मगर इसका एक स्याह पहलू भी है। और वो यह है कि नया राज्य बनने के बाद जो विकास हमें दिखता है वह ज्यादातर मैदानी क्षेत्रों में ही है। पहाड़ी क्षेत्र में जो विकास के कार्य हुए हैं वो पर्याप्त नहीं हैं और इसका सबसे बड़ा प्रमाण है वहाँ से होने वाला पलायन। दुःख की बात है कि उत्तराखण्ड बनाने के लिए जिन लोगों ने संघर्ष किया था उनके मन में पलायन को लेकर भी पीड़ा थी, उन्होंने सोचा था कि नया राज्य बनेगा तो रोजगार बढ़ेंगे और लोगों का पलायन रुकेगा। अब राज्य तो बन गया मगर पलायन नहीं रुका। पलायन लगातार बढ़ रहा है क्यों कि पहाड़ों में विकास न के बराबर हुआ है। 

और अभी हाल ही में समाचार प्राप्त हुआ है कि देहरादून में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट स्टेडियम बनने जा रहा है। गौरतलब है कि देहरादून तो पहले से ही इतना विकसित है और वह राज्य की राजधानी भी है इसके अलावा वन अनुसंधान संस्थान, इंडियन मिलिट्री अकादमी, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान जैसे कई प्रमुख संस्थान पहले से ही देहरादून में हैं और देहरादून के निकट ऋषिकेश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भी खुल रहा है। देहरादून के सामने ही मसूरी भी है जहाँ पर्यटक भारी मात्रा में आते रहते हैं। मतलब विकास और रोजगार का वातावरण देहरादून और उसके अगल - बगल के शहरों तक फैला हुआ है। तो क्या ये अच्छा नहीं होता कि यह क्रिकेट स्टेडियम देहरादून के बजाय किसी पहाड़ी क्षेत्र में बनाया जाता। निश्चित रूप से एक स्टेडियम बनने से उस क्षेत्र में बहुत विकास भले नहीं होता मगर कुछ तो फर्क पड़ता, किसी जगह में स्टेडियम बनता तो किसी क्षेत्र में कुछ और बनता।  इस तरह विकास सब जगह फैलता और रोजगार बढ़ता। रोजगार बढ़ने से जहाँ एक ओर पहाड़ों से पलायन रुकता वहीँ दूसरी ओर शहरों में पड़ने वाला जनसँख्या दवाब भी कम होता। इससे शहर के लोग भी सुकून से रहते और गाँव के लोग भी खुश रहते। मगर ये सब तब होता जब सरकार की नीयत विकास को लेकर साफ़ होती। और ये एक सच्चाई है कि क्षेत्र के लोग जब उत्तरप्रदेश का हिस्सा थे या अब जब वे उत्तराखंड का हिस्सा हैं, दोनों जगह सरकारों ने उनको ठगा है, वो सरकार जिसके ऊपर जिम्मेदारी थी लोगों को उनका हक़ देने की। 

और अंत में : नए राज्य का गठन भाषा या बोली के आधार पर होता है। अब उत्तराखण्ड के गठन के समय बहुत से क्षेत्र ऐसे जोड़ दिए गए हैं जहाँ के लोग उत्तराखंड की बोली नहीं बोलते और उत्तराखण्ड की सीमा से लगे कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ उत्तराखण्ड मूल के लोग रहते हैं और वो उत्तराखण्ड की बोलियां भी बोलते हैं मगर उस क्षेत्र को उत्तराखण्ड में नहीं जोड़ा गया, वो उत्तरप्रदेश में आते हैं। अब ये सब कैसे हुआ और क्यों हुआ ये बात समझ के परे है। समझ में नहीं आता कि इस राज्य को बनाने वाले नेता - मंत्री मूर्ख हैं या उन्होंने इस क्षेत्र के लोगों को मूर्ख बनाया है। 

बुधवार, 20 नवंबर 2013

भारत रत्न का औचित्य


२१ अगस्त २००६, देश के लगभग हर न्यूज़ चैनल में एक खबर चली कि "भारत रत्न से सम्मानित प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद विस्मिल्लाह खान की मृत्यु हो गई है" ! इस खबर से देश के लोगों को दुःख भी हुआ था. मगर इससे भी ज्यादा दुःखद समाचार यह था कि अपने जीवन के अंतिम समय में उस्ताद विमिल्लाह खान बड़ी तंगहाली में जी रहे थे और अपनी बीमारी के इलाज के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं थे !

अब प्रश्न ये उठता है कि इतनी पुरानी  बात को इस समय याद करने का क्या औचित्य ? जब कि देश इस समय सचिन को "भारत रत्न " मिलने कि ख़ुशी में झूम रहा है और कुछ लोग हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को "भारत रत्न " न दिए जाने से नाराज हैं। तो औचित्य इस बात से उठता है कि किसी व्यक्ति को "भारत रत्न " देने से होता क्या है ? क्या उस व्यक्ति का सम्मान पहले से ज्यादा बढ़ जाता है या इस सम्मान के न मिलने से उसका सम्मान कुछ कम रह जाता है। 

अब लता मंगेशकर को "भारत रत्न" मिला है तो क्या उनका सम्मान और अधिक बढ़ गया है या ये पुरुस्कार उन्हें नहीं मिलता तो क्या उनके सम्मान में कुछ कमी रह जाती ? शायद नहीं ! कई लोगों को तो ये ही नहीं मालूम होगा कि लता मंगेशकर को "भारत रत्न" मिला भी है या नहीं .जो लोग उन्हें पसंद करते हैं वो उनके गायन के कारण करते हैं न कि उनके भारत रत्न के कारण। कहने का अर्थ यह है कि देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान को वह सम्मान नहीं मिल पाया है जो उसे मिलना चाहिए था और इसके लिए पूरी तरह से सरकार का ढ़ुल मुल रवैया ही जिम्मेदार है ! जितनी तत्परता से उन्होंने अपने पूर्व नेताओं को "भारत रत्न " बांटा है अगर उसी तत्परता से उन्होंने देश के उन नागरिकों को भी "भारत रत्न " दिया होता जिन्होंने वास्तव में देश का सम्मान बढ़ाया है तो ज्यादा अच्छा होता। 

"भारत रत्न" जो कि देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है वह सरकार के रवैये के कारण आज सिर्फ औपचारिकता बन कर रह गया है या फिर सरकार कि तुच्छ राजनैतिक मानसिकता को दिखाने का माध्यम। अब क्या कारण है कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को भारत रत्न दिया गया है, उन्होंने ऐसा कौन सा काम किया है जिससे देश का नाम रौशन हुआ हो या देश के नागरिकों ने सम्मानित महसूस किया हो। बिलकुल, उन्होंने बहुत से ऐसे काम किये होंगे जो प्रशंशनीय हों , मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वो देश के प्रधान मंत्री थे और वो सारे काम जो उन्होंने किये हैं उसके लिए उन्हें संविधान में पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं ! और इसी काम के लिए जनता ने उन्हें संसद में भेजा था ! और अब कुछ लोग कह रहे हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी को भी भारत रत्न मिलना चाहिए। अगर इसी तरह भारत रत्न का वितरण होना है तो अगला भारत रत्न नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी को देने कि घोषणा पहले ही कर देनी चाहिए। 
बहरहाल सचिन और मेजर ध्यानचंद दोनों का जो लोग सम्मान करते हैं वो उनका सम्मान पहले भी करते थे और अभी भी करते हैं।  उन्हें भारत रत्न मिले या न मिले इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।  यदि फर्क पड़ता तो उस्ताद विस्मिल्लाह खान को इस तरह अपने अंतिम दिन नहीं गुजारने  पड़ते।   

और अंत में : सुना है पहले खिलाड़ियों को भारत रत्न देने का नियम नहीं था मगर अब ये नियम बदला गया है ताकि सचिन को यह सम्मान दिया जा सके। ये अच्छा है मगर इसके साथ यदि नियम यह भी बदला जाता कि अब से किसी नेता को भारत रत्न नहीं दिया जाएगा तो देश के नागरिक शायद इस सम्मान को वास्तव में सर्वोच्च नागरिक सम्मान के रूप में ही लेते ना कि मात्र औपचारिकता के रूप में !